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दण्डी स्वामी सदाशिव ब्रह्मेन्द्रानन्द सरस्वती
दण्डी स्वामी सदाशिव ब्रह्मेन्द्रानन्द सरस्वती
Author: Sadashiva Brahmendranand Saraswati
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© Sadashiva Brahmendranand Saraswati
Description
योग-वेदान्त पर दण्डी स्वामी सदाशिव ब्रह्मेन्द्रानन्द सरस्वती जी के प्रवचन। प्रस्थानत्रयी, योगसूत्र, योगवासिष्ठ इत्यादि के अतिरिक्त श्रीरामचरित मानस, रामायण, महाभारत एवं पुराण इत्यादि की वेदान्तपरक व्याख्या।
510 Episodes
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"मन और शरीर के स्वाभाविक वेगों को नहीं रोकना चाहिए" - इस नियम की अपवादसहित व्याख्या।
एपिसोड 738, योगशास्त्र, यत्पिण्डे तत्ब्रह्माण्डे (अग्निपुराण, अध्याय 214)
विषय सूची -
1-नाडी़चक्र।
2-मुख्यप्राण एवं नौ अन्य प्राणों के स्थान एवं कार्य।
3-शरीर में उत्तरायण एवं दक्षिणायन।
4-शरीर में त्रिदेवों और सूर्य चन्द्र इत्यादि की स्थिति एवं दिनरात, ग्रहण इत्यादि की घटनाएं।
5-अजपा गायत्री
एपिसोड 737. सदाचार शतकम् 13
*देवपूजन सम्बन्धी व्यतिक्रम एवं अशुद्वि इत्यादि का उपचार एवं व्रत सम्बन्धी सामान्य मार्गदर्शन*
विषयसूची -
1. पूजा का लोप हो जाने पर क्या करें।
2. पूजनसामग्री के चूहा कीट इत्यादि द्वारा दूषित होने अथवा अशुद्ध मनुष्य द्वारा स्पर्श हो जाने पर क्या करें।
3. *विशेष ध्यातव्य* - गौ का प्रत्येक अंग शुद्ध किन्तु मुख अशुद्ध होता है और घोडे़ का मुख शुद्ध कहा गया है।
4. पूजन के समय मंत्र में त्रुटि हो जाने पर क्या करें।
5. देवप्रतिमा हाथ से छूटकर गिर जाय तो क्या करें।
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6. स्त्री दीर्घकालीन व्रत में अथवा साधारण व्रत में रजस्वला हो जाय तो क्या करे।
6. व्रत में सूतक आ जाय तो क्या करें।
8. ओषधि इत्यादि वह वस्तुयें जिनके सेवन से व्रतभंग नहीं होता।
9. व्रत के समापन में सामान्यतया क्या करें।
एपिसोड 736. सदाचार शतकम्- 12. षोडश संस्कार
विषयसूची -
1. संस्कारों की कुल संख्या 48 या अल्प मतान्तर से 40 है जिसमें 16 प्रमुख हैं।
2. सोलह संस्कारों के नाम।
3.आरम्भ के नौ संस्कार चारों वर्णों के और स्त्री पुरुष सभी के होते हैं। किन्तु स्त्रियों और शूद्रों के मन्त्ररहित होते हैं।
4. उक्त सोलह में से क्रमांक 10 से 13 तक के संस्कार (यज्ञोपवीत से समावर्तन तक) केवल त्रैवर्णिक पुरुषों का होता है।
* उपनयन संस्कार के विना ओंकार, गायत्री अथवा अन्य किसी वैदिक मन्त्र के जप या स्वाहा, स्वधा, वषट्कार इत्यादि के उच्चारण का अधिकार नहीं। स्त्री शूद्र और विना यज्ञोपवीत वाले त्रैवर्णिक पूजा पाठ में मन्त्रका प्रयोग किये विना देवताओं को केवल नमस्कार कर सकते हैं। जैसे "श्री गणेशाय नमः" "शिवाय नमः"। इसमें ॐ नहीं लगा सकते।
*14वां संस्कार - विवाह सभी वर्णों का होता है।शूद्र का विवाह संस्कार भी मन्त्ररहित होता है।
*त्रैवर्णिक कन्या का विवाहसंस्कार मन्त्रसहित ही होता है, क्योंकि वह वर के साथ संयुक्त है।।
*विवाह समान वर्ण में ही होना चाहिये, न अपने से उत्तम के साथ न अधम के साथ - "विवाहःसदृशैस्तेषां नोत्तमैर्नाधमैस्तथा" - अग्नि,151/13.
*प्रश्न - शूद्र कन्या से कोई त्रैवर्णिक विवाह करे तो मन्त्ररहित होगा या मन्त्रसहित ? उत्तर - शूद्रा से त्रैवर्णिक का विवाह निन्द्य है। विवाह का संस्कार स्त्रीपुरुष के लिये संयुक्त होता है।अतः ऐसा विवाह विना मन्त्र के ही हो सकता है।
प्रश्न - सवर्ण, अनुलोम और प्रतिलोम सम्बन्ध क्या हैं ? उत्तर - अपने वर्ण में विवाह करना सवर्ण सम्बन्ध है।अपने से नीचे वाले वर्ण की कन्या से विवाह करना अनुलोम सम्बन्ध है। अपने से ऊपर के वर्ण वाली कन्या से सम्बन्ध करना प्रतिलोम सम्बन्ध है जो निषिद्ध है, अतः इसे विवाह नहीं कह सकते। इसमें मन्त्ररहित अथवा मन्त्रसहित का प्रश्न ही नहीं बनता।
एपिसोड 735. सदाचार शतकम्- 11. भूमिदान की महिमा और भूमिहरण का दण्ड - बृहस्पति स्मृति के विशेष उल्लेख के साथ।
* सुवर्णदान गोदान और भूमिदान।
* भूमिदान का फल- विशेष वर्णन।
* भूमि पर अन्यायपूर्वक कब्जा करने का फल।
* ब्रह्मस्व हरण का फल।
एपिसोड 734. सदाचारशतकम् 8- 10
*नाभि से ऊपर के सभी अङ्ग पवित्र माने गये हैं, उसमें भी मुख सर्वाधिक पवित्र है। क्योंकि यही शब्दब्रह्म को प्रकट करता है और यही समस्त शरीर का पोषण करता है।
*ब्राह्मण की रचना का उद्देश्य।
*आचारः परमो धर्मः।
*वेदोऽखिलो धर्ममूलम्।
*वेद और धर्मशास्त्र का अर्थ।
*नास्तिक का अर्थ।
*साक्ष्य के नियम - आधुनिक कुतर्कों का समाधान।
*वेद ही परम प्रमाण हैं।
*शास्त्रनियमों में मतभेद होने पर विकल्प - *तुल्यबलविरोधे विकल्पः*। * प्रमाणों की वरीयता का क्रम 1. वेद-वेदाङ्ग, 2.स्मृति, 3. इतिहास, (रामायण, महाभारत) 4. पुराण इत्यादि।
वेदान्त की कक्षा में स्मृतिचर्चा क्यों ? *शास्त्रवचन है कि वेद और स्मृति - यह दोनों द्विजों की दो आंखें हैं। केवल एक को जानने वाला काणा है और जो एक भी नहीं जानता वह पूर्णतः अन्धा है।
* वेदान्त में सभी वर्णों और सभी आश्रमियों का अधिकार है। किन्तु उसके लिये जो साधनचतुष्ट्य की शर्तें हैं, उनको पूर्ण करना आवश्यक है। उन शर्तों को वही पूरा कर सकता है जो सदाचारी हो। सदाचार का ज्ञान स्मृतियों से मिलता है। अतः जो स्मृतियों की निन्दा करता है, जो वर्णाश्रम को नहीं मानता है, वह साधन चतुष्ट्य से बहुत दूर है और उसका वेदान्त पढ़ना उसके लिये और समाज के लिये भी कल्याणकारी न होकर पतनकारी ही होता है। पुनश्च, वेदान्तज्ञान के लिये चित्त का शुद्ध होना आवश्यक है। संसार में ऐसा कौन होगा जो अपने चित्त को अशुद्ध मानता हो? चित्त शुद्ध है, इस बात की परख प्रथमतया सदाचार से ही हो सकती है। सदाचारके पालन से ही चित्त शुद्ध होता है और चित्तशुद्ध होने पर ही तत्वज्ञान होता है।
एपिसोड 733. सदाचार शतकम् कण्डिका 5,6,7 - पाराशर 1.22-39
*वेदका कोई रचनाकार नहीं।
*युगधर्म
*अधर्मी का त्याग
*दान का शिष्टाचार
*कलियुग में अन्नगत प्राण।
*ब्राह्मण के षट्कर्म।
एपिसोड 732. भगवद्गीता 4.25- देवयज्ञ और ज्ञानयज्ञ।
नारायण।
श्रीमद्भगवद्गीता प्रवचनश्रृंखला में अगला श्लोक है 4.25. श्लोक 25 का पूर्वार्ध योगी के लिये और उत्तरार्ध ज्ञानी (संन्यासी) के लिये है। ध्यातव्य है कि इसमें योगी शब्द का प्रयोग कर्मयोगी के लिये हुआ है। वैसे भी भगवद्गीता में सामान्यतः योगी शब्द का अर्थ कर्मयोगी ही है, जब तक कि संदर्भ से कोई अन्य अर्थ न निकलता हो। श्लोक 4.25 से 4.30 तक छः श्लोकों में भगवान् ने बारह प्रकार के यज्ञों का उल्लेख किया है और उन सबमें ज्ञानयज्ञ को सर्वोत्तम बताते हुये 4.33 से 4.38 तक छः श्लोकों में ज्ञान की महत्ता का वर्णन किया है।
4.25 की व्याख्या सुनने से पूर्व निर्वाणषट्कम् का मननपूर्वक पाठ कर लेना व्याख्या समझने में सहायक होगा।
"मनोबुद्ध्यहङ्कार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥१॥
न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चवायुः
न वा सप्तधातुः न वा पञ्चकोशः ।
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायु
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥२॥
न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ
मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः ।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥३॥
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं
न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः ।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥४॥
न मृत्युर्न शङ्का न मे जातिभेदः
पिता नैव मे नैव माता न जन्मः ।
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यं
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥५॥
अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् ।
न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥६॥"
एपिसोड 731. सदाचार शतकम् - कण्डिका 4 - वर्णाश्रम धर्म ही वास्तविक धर्म है। प्रत्येक वर्ण में चारों वर्ण अर्थात् 16 वर्ण हैं।
1. जन्मना और कर्मणा विवाद का सुन्दर निराकरण शिवमहापुराण में है। चारों वर्णों में चार-चार चार चार उपवर्ण हैं। विस्तृत जानकारी के लिये पूर्ववर्ती शिवमहापुराण वाली श्रृंखला में इस विषय से सम्बन्धित एपिसोड को सुनें।
2. दशविध ब्राह्मण - अत्रि 371-381.
3. देवता पितर ब्राह्मण के मुख से ही हव्य कव्य ग्रहण करते हैं - मनुस्मृति, 1/95-100.
एपिसोड 730. सदाचार शतकम्।
कण्डिका 1-3.
इस सदाचार शतकम् श्रृंखला में समस्त स्मृतियों के साररूपमें उन अंशों का संकलन है जो आजके समय में भी व्यवहार्य हैं और प्रत्येक धर्मनिष्ठ व्यक्ति को उनका यथासंभव पालन करना चाहिये।
विषयसूची -
1. दिन-रात का विभाजन, संवत्सर में मनुष्यों, पितरों और देवताओं के दिन-रात का मान (मनु, 1/65-66)।
2. युगधर्म (मनु, 1/85-86)।
3. वर्णधर्म (मनु, 1/88-91, अत्रि, 13-18 एवं 371-381)। पराई स्त्री कितनी भी सुन्दर हो और परधर्म कितना भी अच्छा लगे , उसको स्वीकार करने का परिणाम भयंकर ही होता है।
"एपिसोड 729.
(*आजका स्मृतिवचन* - सर्वेषामेव दानानां विद्यादानं ततोधिकम्। पुत्रादिस्वजने दद्याद्विप्राय च न कैतवे।। सकामः स्वर्गमाप्नोति निष्कामो मोक्षमाप्नुयात्।। अत्रि, 337-38।।
समस्त दानों में विद्याका दान सर्वश्रेष्ठ है। इसे पुत्रशिष्य इत्यादि स्नेहीजनों को और विप्र को देना चाहिये, कपटी को नहीं देना चाहिये। जो किसी कामना से विद्यादान करता है, उसे स्वर्ग की और जो निष्कामभाव से करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।)
अब भगवद्गीता 4.22-24
"ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना।।24।।" की विशेष प्रसिद्धि है।
*विचारबिन्दु*
1. श्लोक 22 में "यदृच्छा" का अर्थ
2. श्लोक 22 में संन्यासी के लिये सिद्धि-असिद्धि का तात्पर्य। संन्यासी को भिक्षा मिलना ही सिद्धि है । जो भिक्षा मिलने और न मिलने में समान भाव रखता है उसीके लिये कहा - समः सिद्धावसिद्धौ च। जो इससे अधिक की अपेक्षा करता है, अथवा सिद्धि का अर्थ कोई चमत्कारी क्षमता समझता है, वह तो संन्यासी कहलाने के योग्य भी नहीं। 2. श्लोक 23 में "यज्ञायाचरतः" का तात्त्पर्य - गृहस्थ के लिये आहुति वाला यज्ञ और संन्यासी के लिये प्राणायाम इत्यादि रूपी यज्ञ जिसको आगे श्लोक 25 से 33 में बताया जायेगा।
3. श्लोक 23 में "समग्रं प्रविलीयते" का अर्थ - स्वर्ग इत्यादि फल भी मोक्ष में विलीन हो जाते हैं। अर्थात् जिस यज्ञ को सकाम भाव से करने पर स्वर्ग इत्यादि की प्राप्ति होती उसी को अनासक्त होकर निष्काम भाव से करने पर मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।
4. श्लोक 24 प्रथमदृष्ट्या अर्थात् लोकप्रसिद्ध हवन-यज्ञ की दृष्टि से ब्रह्मचारी, गृहस्थ और वानप्रस्थियों के लिये प्रतीत होता है, क्योंकि संन्यासी अग्नि में आहुति नहीं दे सकता। किन्तु इसे आगे के श्लोकों (25 से 33) के साथ समझना है। तदनुसार यज्ञ की विस्तृत परिभाषा की दृष्टि से यह संन्यासी के लिये भी है।
5. "अर्पण" का अर्थ - शाङ्करभाष्य और शाङ्कर परम्परानुसारी व्याख्याओं और तिलककृत व्याख्या की तुलना। वस्तुतः अर्पण में दोनों ही अर्थ एक साथ निहित हैं। तिलक की व्याख्या को शाङ्कर व्याख्या का विस्तार समझना चाहिये, विरोधाभासी नहीं। तिलक ने हठात् छिद्रान्वेषण किया है। उन्होने मधुसूदनी टीका पर दृष्टिपात कर लिया होता तो शाङ्करभाष्य की आलोचना नहीं करते।
.....
एपिसोड 728.
भगवद्गीता 4.21 नोट- श्लोक 21 से 24 विशेषतः संन्यासियों के लिये है।
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्त सर्वपरिग्रहः।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।। 21।। ध्यातव्य -
व्याख्या में भगवद्गीताकी शंकरानन्दी टीका और श्रीमद्भागवत ग्यारहवें स्कन्ध में भगवान् के वचन का उल्लेख करते हुये कहा है कि - संन्यासी यमों का पालन करे किन्तु नियमों का त्याग कर दे। ध्यातव्य है कि यहां नियमों से तात्पर्य है - कर्मकाण्ड सम्बन्धी नियम। पातञ्जलयोगसूत्र में जो नियम की परिभाषा है उसके अनुसार नियमों का त्याग कहना अनर्थकारी हो जायेगा।
*भगवद्गीता और योगवासिष्ठ के अध्ययन सम्बन्धी तुलनात्मक सुझाव*
नारायण।
कभी कदाचित् हम योगवासिष्ठ महारामायण की चर्चा कर देते हैं। योगवासिष्ठ अत्यन्त गूढ़ ग्रन्थ है। वेदान्त की सम्यक् समझ हो जाने के उपरान्त ही इसको पढ़ना चाहिये।
ध्यातव्य है कि इस विशाल ग्रन्थ में गुरु वसिष्ठ द्वारा भगवान् राम को दिये गये उपदेश का वर्णन है।
भगवद्गीता और योगवासिष्ठ की पृष्ठभूमि में समानता यह है कि दोनों का उपदेश मोहग्रस्त क्षत्रिय को उसके कर्म में प्रवृत्त करने के लिये हुआ। अन्तर यह है कि भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण गुरु हैं और उनका सखा अर्जुन शिष्य, किन्तु योगवासिष्ठ में स्वयं भगवान् ही शिष्य हैं और उनके गुरु वसिष्ठ जी उपदेशक। अर्जुन के मोहयुक्त वैराग्य का तो प्रत्यक्ष लौकिक कारण था, किन्तु श्रीराम के वैराग्य का कोई लौकिक कारण ही नहीं था। वह आन्तरिक अथवा स्वाभाविक वैराग्य था। भगवद्गीता का उपदेश युद्धभूमि में कुछ ही समय में हुआ, जबकि योगवासिष्ठ का उपदेश न्यूनतम तीस दिन तक चला (subject to re-calculation) और प्रतिदिन पूर्वाह्न अपराह्न दोनों सत्रों में अर्थात् सम्पूर्ण दिवस चलता था। यदि आकार की दृष्टि से देखें तो भगवद्गीता जितना उपदेश प्रतिदिन करने पर यह 45 से 50 दिन में पूर्ण होता। विषय गूढ़ है और भगवान् राम के प्रश्न भी विस्तृत हैं अतः सम्पूर्ण दिवस उपदेश होने पर अनवरत तीस दिन लगा।
विचारणीय है कि स्वयं भगवान् मोहग्रस्त हुये तो वह मोह कितना जटिल रहा होगा?
कहने का तात्पर्य यह है गीता पढ़ने से ही बहुत से भावुक लोग अर्थ का अनर्थ करते हुये भ्रमित अथवा मोहग्रस्त हो जाते हैं- अपने कर्तव्य से विमुख होकर वैराग्य भाव में चले जाते हैं। ऐसे लोग योगवासिष्ठ पढ़ लेंगे तो क्या स्थिति होगी? इसलिये गीता और योगवासिष्ठ का ठीक तात्पर्य ज्ञानी गुरु से ही जानना चाहिये। स्वाध्याय का उचित व्यावहारिक क्रम यह है कि पहले श्रीरामचरित मानस पढे़ं, तदुपरान्त भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत इत्यादि उसके बाद उपनिषदग्रन्थ पढे़ं और अन्त में योगवासिष्ठ।
यह भी ध्यान दें कि वेदान्त में प्रवेश करने के लिये न्यायशास्त्र की आरम्भिक जानकारी आवश्यक है। शङ्कराचार्य के लघुग्रन्थों मणिरत्नमाला, तत्वबोधः इत्यादि का अध्ययन भी प्रस्थानत्रयी से पूर्व कर लेना चाहिये।
।।गीताजयन्ती विशेषांक।।
विचार विन्दु-
1. गीता कर्मशास्त्र है अथवा ब्रह्मविद्या ?
2. गीता भगवान् का भी आश्रय है -
"गीताश्रयेऽहं तिष्ठामि गीता मे परमं गृहम्।
गीताज्ञानमुपाश्रित्य त्रींल्लोकान्पालयाम्यहम्।।"
3.गीता में अकर्मण्य गृहस्थ और आडम्बरयुक्त संन्यासी दोनों को फटकार लगाया गया है।
4. जो कर्मवादी टीकाकार संन्यास की निन्दा करते हुये गीताको केवल कर्मशास्त्र बताते हैं , वे गीता के तात्पर्य को नहीं जानते। जो गीता को केवल ब्रह्मविद्या मानते हैं , वे भी गीता का तात्पर्य नहीं समझते।
तिलक इत्यादि की टीकायें अवैदिक अनपनिषदिक और अनर्थकारी हैं। उनको ठीक मानने से गीता माहात्म्य में कहे गये "सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालन्दनः" इत्यादि वाक्य व्यर्थ हो जायेंगे।
5.ध्यातव्य है कि अर्जुन क्षत्रिय और गृहस्थ थे।गीता उपदेश का प्रत्यक्ष उद्देश्य था अर्जुन के शोक मोह को दूर कर उनसे क्षात्रधर्म का पालन कराना। परोक्ष उद्देश्य था लोककल्याणार्थ उपनिषदों के रहस्य का उपदेश करना। अतः श्रीमद्भगवद्गीता गृहस्थ और संन्यासी दोनों के लिये है। किन्तु प्रसंगानुसार उसका वही अर्थ ग्रहण करना चाहिये जो अपने लिये लागू हो और उस अर्थको दूसरे पर नहीं थोपना चाहिये।
6. गीतामें निष्कामकर्म और नैष्कर्म्य दोनों का उपदेश है। निष्कामकर्म गृहस्थ के लिये है और नैष्कर्म्य संन्यासी के लिये।
7. तिलक का गीतारहस्य गृहस्थों के अनुरूप है, उसे विरक्त संन्यासियों पर नहीं थोप सकते। उसमें पक्षपात भी है। तिलक द्वारा संन्यास की निन्दा अवैदिक है। शाङ्करभाष्य और शाङ्करपरम्परा के आचार्यों की टीकाओंमें गृहस्थ और विरक्त दोनोंके अधिकारानुसार सम्यक् विवेचन है।
8. गीता में "कर्म ही है, संन्यास नहीं" अथवा "संन्यास ही है, कर्म नहीं" - इस प्रकार की खींचातानी व्यर्थ और हानिकर है।
9. उक्त विन्दुओं पर धर्मसम्राट् करपात्रीजी के प्रवचनों का सार।
एपिसोड 725. सपठित एपिसोड 98 (पातञ्जल योगसूत्र 1.5 का पूरक)
*विषयसूची* -
*येन त्यजसि तत्त्यज का अर्थ।
*मन का स्वरूप - न्यायशास्त्र के अनुसार, मन नौ द्रव्यों में से एक द्रव्य है जो सुख-दुःख इत्यादि की उपलब्धि का साधन है। वे नौ द्रव्य हैं - पृथिवी, जल, तेज, वायु ,आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन। इसमें मन की परिभाषा है- "सुखाद्युपलब्धिसाधनमिन्द्रियं मनः। तच्च प्रत्यात्मनियतत्वादनन्तं परमाणुरूपं नित्यञ्च।"
*चरकसंहिता के अनुसार मन का स्वरूप।
* 'येन त्यजसि तत्त्यज" में पातञ्जल योगदर्शन, चरकसंहिता, तर्कसंग्रहः, योगवासिष्ठ महारामायण, संन्यासोपनिषद और महाभारत की संगति।
*अन्तःकरण चतुष्ट्य - मन, बुद्धि, चित्त अहंकार की संनष्लिष्टता।
एपिसोड 724. भगवद्गीता 4.20.
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित् करोति सः।।
विचारविन्दु -
* कर्मफलासङ्ग के दो अर्थ - 1. निष्काम कर्म । 2. कर्मका फल है यह शरीर - कर्मफलरूप इस शरीर में आसक्ति को त्यागकर।
*नित्यतृप्त का अर्थ।
*निराश्रय का अर्थ।
*श्लोक के उत्तरार्ध का तात्पर्य ।
*ज्ञान हो जाने पर भी मनोनाश और वासनाक्षय के लिये अभ्यास करते रहना चाहिये।
गुरु से मन्त्र ग्रहण करने के लिये मार्गशीर्ष क्यों उत्तम है ?
क्योंकि श्रीमद्भगवद्गीता, दशम अध्याय में स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ने इसे सर्वोत्तम मास कहते हुये कहा है कि मासोंमें मैं मार्गशीर्ष हूँ - "*मासानां मार्गशीर्षोऽहं* ऋतूनां कुसुमाकरः"।।
श्रीकृष्ण जगद्गुरु हैं- "कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।" वह साक्षात् नारायण हैं। नारायण आदिगुरु हैं। नारायण से ही गुरुपरम्परा आरम्भ होती है - "नारायणं पद्मभुवं वसिष्ठं ... ."।
स्कन्दपुराण में ब्रह्मा जी द्वारा जिज्ञासा करने पर भगवान् कहते हैं -
"सर्वयज्ञेसु यत्पुण्यं सर्वतीर्थेषु यत्फलम्।
तत्फलं समवाप्नोति मार्गशीर्षे कृते सुत।।......
एपिसोड 722. भागवतसुधा 14. पुराणप्रवक्ता सूतजी जाति से सूत नहीं, ब्राह्मण थे।
(साभार, श्रीभागवतसुधा, धर्मसम्राट करपात्रीजी और पुराणविमर्श, आचार्य बलदेव उपाध्याय)
*सूत दो प्रकार के। एक - क्षत्रिय पुरुष से ब्राह्मणी स्त्री में उत्पन्न संतान जिनको धर्मशास्त्र के अनुसार सूत कहा जाता है, और दूसरे- यज्ञकुण्ड से उत्पन्न सूतजी। इन दूसरे सूतजीमें भी सांकर्य था किन्तु हवि का। बृहस्पति और इन्द्र की हवियों का मिश्रण हो गया था। इसलिये सूत कहा गया। ब्राह्मणों ने इनमें ब्राह्मणत्व का आधान कर पुराणेतिहास की कथा के लिये प्रेरित किया।
* जो जाति से सूत होते थे उनके लिये अश्वपालन और रथ हांकने का कार्य नियत था। वे राजाओं की वंशावली के ज्ञाता होते थे जो कि पुराणों का अभिन्न अङ्ग है। इस कारण से भी पुराणप्रवक्ता रोमहर्षण जी को लक्षणया सूत कहा जाने लगा और सूत व्यक्ति एवं सूत जाति में भ्रम हो गया।
एपिसोड 721. भागवतसुधा 13.
विषयसूची -
1. वाल्मीकीय रामायण से विरोधाभास का निराकरण। श्रीमद्भागवत के अनुसार वारुणी को भगवान् की अनुमति से दैत्यों ने ग्रहण किया।
3. श्लोक संख्या 8/8/8 जिसको विगत अष्टमी (संवत्सर के आठवें मास की अष्टमी तिथि - गोपाष्टमी को सत्संग समूहमें बताये थे।)
3. अमृतपान के लिये विवाद और भगवान् का मोहिनी अवतार ।
4. भगवान् द्वारा छलपूर्वक केवल देवताओं में अमृत वितरण और राहु द्वारा छलपूर्वक देवताओं की कतार में बैठना ... ।
5. समुद्रमंथन कथा का समाजिक निहितार्थ या शिक्षा -
1.उद्यम करने पर आरम्भ में अप्रिय अथवा प्रतिकूल लक्षण प्रकट हों अथवा बाधायें उपस्थित हों तो निराश नहीं होना चाहिये। समुद्रमंथन अमृत के लिये किया गया था। किन्तु सर्वप्रथम विष प्रकट हुआ। अमृत तो सबसे अन्त में निकला। (नोट - विभिन्न पुराणों और वाल्मीकीय रामायण इत्यादि में समुद्रमंथन से उत्पन्न होने वाली वस्तुओं की संख्या और क्रम में अन्तर है। यहां श्रीमद्भागवतकी चर्चा चल रही है, अतः उसी के अनुसार बता रहे हैं।)
2. देवता और दैत्य दोनों ने समान उद्यम किया किन्तु अमृत देवताओं को ही प्राप्त हुआ क्योंकि उनकी भगवान् में भक्ति थी। तात्पर्य यह है कि सफलता केवल उद्यम से नहीं मिलती। उद्यम और भगवत्कृपा दोनों का होना आवश्यक है।
3.भक्तों की भलाई के लिये आवश्यकता पड़ने पर भगवान् छल का भी प्रयोग करते हैं।
6. माहात्म्य - समुद्रमंथन की कथा पढ़ने सुनने का उद्यम कभी भी निष्फल नहीं होता।




