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Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ)
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Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ)

Author: Vivek Agarwal

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Description

This podcast presents Hindi poetry, Ghazals, songs, and Bhajans written by me.
इस पॉडकास्ट के माध्यम से मैं स्वरचित कवितायेँ, ग़ज़ल, गीत, भजन इत्यादि प्रस्तुत कर रहा हूँ

Awards
StoryMirror - Narrator of the year 2022, Author of the month (seven times during 2021-22)
Kalam Ke Jadugar - Three Times Poet of the Month.

Sometimes I also collaborate with other musicians & singers to bring fresh content to my listeners. Always looking for fresh voices. Write to me at HindiPoemsByVivek@gmail.com

#Hindi #Poetry #Shayri #Kavita #HindiPoetry #Ghazal
96 Episodes
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बड़ा टूट कर दिल लगाया है हमने जुदाई को हमदम बनाया है हमने तेरा अक्स आँखों में हमने छिपाया तभी तो न आँसू भी हमने बहाए तेरा नूर दिल में अभी तक है रोशन 'अक़ीदत से तुझको इबादत बनाकर लबों पर ग़ज़ल सा सजाया है हमने.. बड़ा टूट कर दिल लगाया है हमने सबब आशिक़ी का भला क्या बतायें ये दिल की लगी है तो बस दिल ही जाने न सोचा न समझा मोहब्बत से पहले सुकूं चैन अपना मेरी जान सब कुछ तेरी जुस्तुजू में गँवाया है हमने बड़ा टूट कर दिल लगाया है हमने बड़ा टूट कर दिल लगाया है हमने जुदाई को हमदम बनाया है हमने Lyrics - Vivek Agarwal "Avi" Guitar & Vocal - Randhir Singh You can write to me at HindiPoemsByVivek@gmail.com
तुम को देखा तो ये ख़याल आया। प्यार पाकर तेरा है रब पाया। झील जैसी तेरी ये आँखें हैं। रात-रानी सी महकी साँसें हैं। झाँकती हो हटा के जब चिलमन, जाम जैसे ज़रा सा छलकाया। तुम को देखा …… देखने दे मुझे नज़र भर के। जी रहा हूँ अभी मैं मर मर के। इस कड़ी धूप में मुझे दे दे, बादलों जैसी ज़ुल्फ़ की छाया। तुम को देखा …… ज़िंदगी भर थी आरज़ू तेरी। तू ही चाहत तू ज़िंदगी मेरी। पास आकर भी दूर क्यूँ बैठे, चाँद सा चेहरा क्यूँ है शरमाया। तुम को देखा …… तुम को देखा तो ये ख़याल आया। प्यार पाकर तेरा है रब पाया। You can write to me at HindiPoemsByVivek@gmail.com
एक किताब सा मैं जिसमें तू कविता सी समाई है, कुछ ऐसे ज्यूँ जिस्म में रुह रहा करती है। मेरी जीस्त के पन्ने पन्ने में तेरी ही रानाई है, कुछ ऐसे ज्यूँ रगों में ख़ून की धारा बहा करती है। एक मर्तबा पहले भी तूने थी ये किताब सजाई, लिखकर अपनी उल्फत की खूबसूरत नज़्म। नीश-ए-फ़िराक़ से घायल हुआ मेरा जिस्मोजां, तेरे तग़ाफ़ुल से जब उजड़ी थी ज़िंदगी की बज़्म। सूखी नहीं है अभी सुर्ख़ स्याही से लिखी ये इबारतें, कहीं फ़िर से मौसम-ए-बाराँ में धुल के बह ना जायें। ए'तिमाद-ए-हम-क़दमी की छतरी को थामे रखना, शक-ओ-शुबह के छींटे तक इस बार पड़ ना पायें। Write to me at HindiPoemsByVivek@Gmail.com
कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया   साहिर उस दौर के शायर थे जब शायरी ग़म-ए-जानाँ तक न सिमट ग़म-ए-दौराँ की बात करने लगी थी। इस ग़ज़ल का मतला भी ऐसा ही है जो न सिर्फ खुद के गम पर हालात के गम का ज़किर भी करता है। आज इसी ग़ज़ल में कुछ और अशआर जोड़ने की हिमाकत की है। मुलाइज़ा फरमाइयेगा।
आओ बच्चों आज तुमको, एक पाठ नया पढ़ाता हूँ। प्रकृति हमको क्या सिखलाती, ये तुमको बतलाता हूँ। Full Poem is available for listening You may write to me at HindiPoemsByVivek@Gmail.com
एक ग़ज़ल लिखी है चन्दा पर, छत पर आके पढ़ लेना। है तेरी याद में गाया नगमा, जब हवा बहे तो सुन लेना। Full Poem is available in video & audio format. You can write to me at HindiPoemsByVivek@gmail.com
चलो इस जनवरी जन जन को जगाते हैं। बैर और नफरत की दीवार को, मिलकर मिटटी में मिलाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। व्यर्थ का यह वाद विवाद, इसका प्रत्युत्तर उसका प्रतिवाद, पूर्वाग्रहों को मन से हटा, सब लोग करें सार्थक संवाद। तुम अपनी कहो, हम अपनी सुनाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। व्यक्ति को है जब गुस्सा आता। विवेक कहीं है तब खो जाता। अपशब्द अनर्गल प्रलाप करे वो, मगर बाद में वो है पछताता। क्रोध में कहा सुना, साथ मिलकर भुलाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। चाहे दिन हो या हो रातें, सुनने में आतीं कड़वी बातें, क्या करना कटुता से हमको, गिनती की जब हैं मुलाकातें। क्यूँ ना वाणी में गुड़ की, मिठास मिलाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। वही चैन की नींद है सोता, जो मोती रिश्तों के पिरोता, तर्क जीतना बहुत सरल है, दिल जीतना मुश्किल होता। अपने आहत मित्रों को प्रेम से मनाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। प्रभु सत्य मार्ग हमको दिखलाना, सबक सही सबको सिखलाना, याद रहे कभी भूल न पायें, बात खरी मन में लिखलाना। आँखों पर चढ़ा, शक़ का चश्मा हटाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। आसान बहुत है मार्ग बताना, कठिन मगर स्वयं चल पाना, जैसा चाहो व्यवहार सभी से, वैसे पहले खुद करके जाना। दूसरों से पहले, आज स्वयं को समझाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। हो बलवान या हो कमजोर, नरम हृदय हों न बनें कठोर, टूटी नहीं पर उलझ गयी है, सबको जोड़े जो नेह की डोर। दिल के उलझे धागों को फिर से सुलझाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। भारत देश है गौरव अपना, क्यूँ न हो ये सबका सपना, भूख रहे न रोग रहे यहाँ, किसी को कभी न पड़े तड़पना। मिल कर संवेदना का, मरहम लगाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। इस भूमि का इतिहास महान, राम कृष्ण का कर ले ध्यान, वीरों के शोणित से सिंचित है, मातृभूमि पर हो हमको अभिमान। गौरवपूर्ण गाथाओं को, पुनः याद दिलाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। ये जीवन है बस एक बसेरा, सब उसका न तेरा न मेरा, सोचने वाली बात है आखिर, छोड़ रोशनी क्यों चुने अँधेरा। स्नेहघृत व विश्वास-बाती से, सत्य-दीप जलाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। है शाश्वत सत्य सनातन धर्म, आज समझ लो इसका मर्म, अपनी पीड़ा तो सबको दुःख देती, पर पीड़ा हरना ही सर्वोत्तम कर्म। गीता हो या ग्रन्थ गुरु का, सब यही बतलाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। स्वरचित और मौलिक विवेक अग्रवाल
।। कविता मेरी विवशता है ।। कविता मेरा शौक नहीं, कविता मेरी विवशता है। जीवन के दिये जो अवसर त्यागे उनका खेद खटकता है। कविता मेरी विवशता है। जीवन पथ तो चलता जाये, तरह तरह के मोड़ भी आये। कुछ राहें तो स्वयं चुनी थीं, कुछ रस्ते किस्मत से पाये। राहें जो यूँ ही छूट गयीं, उनका प्रतिबिम्ब झलकता है। कविता मेरी विवशता है। जीवन हमको सबक सिखाये, नित नूतन एक पाठ पढ़ाये। कुछ सीखों को मान गये हम, कुछ सीखों को जान ना पाये। जिन सीखों को भूल गये अब, उनका परिणाम पनपता है। कविता मेरी विवशता है। जीवन ने कई लोग मिलाये, कुछ अपने कुछ हुये पराये। कुछ लोगों ने हमें संभाला, कुछ ने बस रोड़े अटकाये। व्यक्ति जो यूँ ही चले गये, उनका अभाव अब खलता है। कविता मेरी विवशता है। जीवन ने कई गीत सुनाये, कुछ भावुक कुछ जोश जगाये। कुछ को तो बस सुना था हमने, कुछ गीत हमने भी गाये। गीत जो हमने सुने नहीं, उनका संगीत ही बजता है। कविता मेरी विवशता है। जीवन सुख दुःख दोनों लाये, कभी हँसाये कभी रुलाये। कभी हर्ष से नृत्य किया तो, कभी दर्द से आँसू आये। क्रंदन जो अंदर रोक लिया, उसका सैलाब उमड़ता है। कविता मेरी विवशता है। जीवन ने कई प्रश्न दिखाये, कुछ सुगम कुछ दुष्कर पाये। कुछ प्रश्नों में सिफर मिला तो, कुछ में अव्वल नंबर आये। प्रश्न जो यूँ ही छोड़ दिये, उनका जवाब अब दिखता है। कविता मेरी विवशता है। जीवन ने बहुत मंच सजाये, हमको भी कई पात्र सुझाये। कुछ नाटकों के नायक हम थे, कुछ में छोटा रोल निभाये। भूमिकायें जो हमने की ही नहीं, अब उनका अक्स उभरता है। कविता मेरी विवशता है। जीवन आगे बढ़ता जाये, नये नये सम्बन्ध दिखाये। कुछ रिश्ते तो पहले से थे, कुछ नाते थे स्वयं बनाये। रिश्ते जो यूँ ही टूट गये, अब उनका दर्द कसकता है। कविता मेरी विवशता है। काफी कुछ किसी कारण से, कभी मैं कह ना पाया। और हृदय की गागर में वो, भरता सब कुछ आया। भरने के पश्चात घट वही, छलक छलक छलकता है। कविता मेरी विवशता है। कविता मेरा शौक नहीं, कविता मेरी विवशता है। ~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)
हम दोनों हम दोनों नदिया के तीरे मध्य हमारे अविरल धारा अलग अलग अपनी दुनिया पर अनाद्यनंत रहे साथ हमारा अलग अलग अपनी राहें हैं अपनी अपनी जिम्मेदारी अपनी खुशियां, अपने दुःख हैं फिर भी अपनी साझेदारी मेरे तट पर जब मावस का घना अँधेरा छा जाता है तेरे तट का पूनम चन्दा मेरा मन भी बहलाता है तेरे तट पर जब आंधी में पुष्प लताएं सिहराती हैं मेरे तट के वट वृक्षों की शाख उधर ही बढ़ जाती हैं ग्रीष्म ऋतू में तप्त हवायें जब मेरे तट को झुलसाती हैं तेरे तट से मंद बयारें मरहम बन कर आ जाती हैं तेरे तट पर जब सर्दी में हिम की चादर बिछ जाती हैं मेरे आलिंगन की गर्मी ले शुष्क हवायें उड़ जाती हैं कभी कोई पर्ण मेरे तट से तेरे तट तक बह जाता है अनकही बातों को मेरी कान में तेरे कह जाता है और कभी हवा का झोंका तेरे तट से आ जाता है तेरी श्वासों की खुशबू से मेरा तट महका जाता है एक तट पर एकाकीपन की नीरवता जब छा जाती है दूजे तट से एक सोन चिरैया गीत हर्ष के गा जाती है नहीं किये कोई वादे हमने कोई वचन न तोड़े हैं जीवन की ये बहती नदिया हम दोनों को जोड़े है - विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित, All Rights Reserved)
तुम्हें उदास-सा पाता हूँ मैं कई दिन से न जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुम वो शोख़ियाँ, वो तबस्सुम, वो क़हक़हे न रहे हर एक चीज़ को हसरत से देखती हो तुम छुपा-छुपा के ख़मोशी में अपनी बेचैनी ख़ुद अपने राज़ की तशहीर बन गयी हो तुम मेरी उम्मीद अगर मिट गयी तो मिटने दो उम्मीद क्या है बस एक पेशो-ओ-पश है कुछ भी नहीं मेरी हयात की ग़मग़ीनियों का ग़म न करो ग़म हयात-ए-ग़म यक नक़्स है कुछ भी नहीं तुम अपने हुस्न की रानाईयों पर रहम करो वफ़ा फ़रेब तुल हवस है कुछ भी नहीं मुझे तुम्हारे तग़ाफ़ुल से क्यूँ शिकायत हो मेरी फ़ना मेरे एहसास का तक़ाज़ा है मैं न जानता हूँ के दुनिया का ख़ौफ़ है तुमको मुझे ख़बर है ये दुनिया अजीब दुनिया है यहाँ हयात के पर्दे में मौत चलती है शिकस्त साज़ की आवाज़ में रू नग़्मा है मुझे तुम्हारी जुदाई का कोई रंज नहीं मेरे ख़याल की दुनिया में मेरे पास हो तुम ये तुमने ठीक कहा है तुम्हें मिला न करूँ मगर मुझे बता दो कि क्यूँ उदास हो तुम खफ़ा न हो मेरी जुर्रत-ए-तख़्तब पर तुम्हें ख़बर है मेरी ज़िंदगी की आस हो तुम मेरा तो कुछ भी नहीं है मैं रो के जी लूँगा मगर ख़ुदा के लिये तुम असीर-ए-ग़म न रहो हुआ ही क्या जो ज़माने ने तुम को छीन लिया यहाँ पर कौन हुआ है किसी का सोचो तो मुझे क़सम है मेरी दुख भरी जवानी की मैं ख़ुश हूँ मेरी मोहब्बत के फूल ठुकरा दो मैं अपनी रूह की हर एक ख़ुशी मिटा लूँगा मगर तुम्हारी मसर्रत मिटा नहीं सकता मैं ख़ूद को मौत के हाथों में सौँप सकता हूँ मगर ये बर-ए-मुसाइब उठा नहीं सकता तुम्हारे ग़म के सिवा और भी तो ग़म हैं मुझे निजात जिनसे मैं एक लहज़ पा नहीं सकता ये ऊँचे ऊँचे मकानों की देवड़ीयों के तले हर काम पे भूके भिकारीयों की सदा हर एक घर में अफ़्लास और भूक का शोर हर एक सिम्त ये इन्सानियत की आह-ओ-बुका ये करख़ानों में लोहे का शोर-ओ-गुल जिसमें है दफ़्न लाखों ग़रीबों की रूह का नग़्मा ये शरहों पे रंगीन साड़िओं की झलक ये झोँपड़ियों में ग़रीबों के बे-कफ़न लाशें ये माल रोड पे कारों की रैल पैल का शोर ये पटरियों पे ग़रीबों के ज़र्दरू बच्चे गली गली में बिकते हुए जवाँ चेहरे हसीन आँखों में अफ़्सुर्दगी सी छायी हुई ये जंग और ये मेरे वतन के शोख़ जवाँ खरीदी जाती हैं उठती जवानियाँ जिनकी ये बात बात पे कानून और ज़ब्ते की गिरफ़्त ये ज़ीस्क़ ये ग़ुलामी ये दौर-ए-मजबूरी ये ग़म हैं बहोत मेरी ज़िंदगी मिटाने को उदास रह के मेरे दिल को और रंज न दो - साहिर लुधियानवी
कालिदास! सच-सच बतलाना इन्दुमती के मृत्युशोक से अज रोया या तुम रोये थे? कालिदास! सच-सच बतलाना! शिवजी की तीसरी आँख से निकली हुई महाज्वाला में घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम कामदेव जब भस्म हो गया रति का क्रंदन सुन आँसू से तुमने ही तो दृग धोये थे कालिदास! सच-सच बतलाना रति रोयी या तुम रोये थे? वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका प्रथम दिवस आषाढ़ मास का देख गगन में श्याम घन-घटा विधुर यक्ष का मन जब उचटा खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर चित्रकूट से सुभग शिखर पर उस बेचारे ने भेजा था जिनके ही द्वारा संदेशा उन पुष्करावर्त मेघों का साथी बनकर उड़ने वाले कालिदास! सच-सच बतलाना पर पीड़ा से पूर-पूर हो थक-थककर औ' चूर-चूर हो अमल-धवल गिरि के शिखरों पर प्रियवर! तुम कब तक सोये थे? रोया यक्ष कि तुम रोये थे! कालिदास! सच-सच बतलाना! साभार - कवि नागार्जुन
यह कविता मेरे सहपाठी व मित्र श्री सिद्धार्थ रंजन की माताजी श्रीमती शची रानी की पुस्तक सूनृता से उनके आग्रह पर ली गयी है
चांदनी की पांच परतें सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की एक प्रसिद्ध कविता है, जिसमें एक साथ कई अनुभूतियों का अद्भुत समागम होता है यहाँ प्रेम के साथ पीड़ा है, आशा के साथ आशंका है और विश्वास के साथ है विवशता बहुत कम शब्दों में बहुत कुछ कह जाती है यह कविता
महादेवीजी का शब्दों का चुनाव तो विलक्षण था ही परन्तु कविता के माध्यम से एक रंग बिरंगा चित्र बना देने की उनकी शक्ति अतुलनीय थी उनकी कविताओं में एक अलग ही सम्मोहन शक्ति है जो पाठकों और श्रोताओं को अपनी ओर आकर्षित कर एक मायानगरी में ले जाती है जहां आप भावनाओं की निर्झरिणी में गोते लगाते रहने के लिए विवश हो जाते हैं सजल है कितना सवेरा गहन तम में जो कथा इसकी न भूला अश्रु उस नभ के, चढ़ा शिर फूल फूला झूम-झुक-झुक कह रहा हर श्वास तेरा राख से अंगार तारे झर चले हैं धूप बंदी रंग के निर्झर खुले हैं खोलता है पंख रूपों में अंधेरा कल्पना निज देखकर साकार होते और उसमें प्राण का संचार होते सो गया रख तूलिका दीपक चितेरा अलस पलकों से पता अपना मिटाकर मृदुल तिनकों में व्यथा अपनी छिपाकर नयन छोड़े स्वप्न ने खग ने बसेरा ले उषा ने किरण अक्षत हास रोली रात अंकों से पराजय राख धो ली राग ने फिर साँस का संसार घेरा स्रोत पुस्तक : संधिनी  रचनाकार : महादेवी वर्मा प्रकाशन : लोकभारती प्रकाशन संस्करण : 2012
१९६२ में भारत चीन युद्ध में जब भारत को पराजय का सामना करना पड़ा तो पूरा देश स्तब्ध था और दिनकरजी भी इसका अपवाद नहीं थे स्वाभिमान पर लगी चोट और वीर सैनिकों के बलिदान के दुःख की अभिव्यक्ति है परशुराम की प्रतीक्षा दिनकरजी को कैसा प्रतीत हुआ होगा, इसका अनुभव मुझे २६ नवम्बर २००८ को हुआ जब मुंबई आतंकी हमलों के पश्चात देश में विवशता का वातावरण था ऐसा लग रहा था की कोई भी हमारे नगरों में आकर हम पर आक्रमण कर सकता है और हम कुछ नहीं कर सकते तब ये एक बार पुनः स्मरण हो आया था की शांति के लिए शक्ति और शक्ति प्रदर्शन अनिवार्य है और तभी आरम्भ हो गयी थी एक प्रतीक्षा
अलौकिक पर्व है आया, ख़ुशी हर ओर छाई है।महादेवी सदाशिव के, मिलन की रात आई है॥धवल तन नील ग्रीवा में, भुजंगों की पड़ी माला।सुसज्जित सोम मस्तक पर, जटा गंगा समाई है॥सवारी बैल नंदी की, चढ़ी बारात भूतों की।वहीँ गन्धर्व यक्षों ने, मधुर वीणा बजाई है॥पुरोहित आज ब्रह्मा हैं, बड़े भ्राता हैं नारायण।हिमावन तात माँ मैना, को जोड़ी खूब भाई है॥अटारी चढ़ निहारे हैं, भवानी चंद्रशेखर को।मिली आँखों से जब आँखें, वधू कैसी लजाई है॥अनूठा आज मंगल है, महाशिवरात्रि उत्सव का।सकल संसार आनंदित, बधाई है बधाई है॥जगत कल्याण करने को, सदा तत्पर मेरे भोले।हलाहल विष पिया हँस कर, धरा सारी बचाई है॥नमन श्रद्धा सहित मेरा, करो स्वीकार चरणों में। समर्पित शक्ति-औ-शिव को, ग़ज़ल ‘अवि’ ने बनाई है॥-----------------Lyrics - Vivek Agarwal AviMusic & Vocal - Suno AIYou can write to me at HindiPoemsByVivek@gmail.com
पवित्र पुण्य भारती (पञ्चचामर छंद)भले अनेक धर्म हों, परन्तु एक धाम है।पवित्र पुण्य भारती, प्रणाम है प्रणाम है॥समान सर्व प्राण हैं, विधान संविधान है।महान लोकतंत्र है, स्वतंत्रता महान है।तिरंग हाथ में उठा, कि आन बान शान है।कि कोटि कंठ गूंजता, सुभाष राष्ट्र गान है।ललाट गर्व से उठा, न शीश ये कभी झुका।सदैव साथ देश का, स्वदेश भक्ति काम है॥पवित्र पुण्य भारती, प्रणाम है प्रणाम है॥अनेक पुष्प हैं लगे, परन्तु एक हार है।अनेक ग्रन्थ हैं यहाँ, हितोपदेश सार है।अनेक हाथ जो मिले, प्रचंड मुष्टि वार है। समक्ष शत्रु जो मिले, लहू सनी कटार है।अदम्य वीर साहसी, सपूत मात के वही।कि काट शीश जो धरे, वही रहीम राम है॥पवित्र पुण्य भारती, प्रणाम है प्रणाम है॥ दिपावली कि ईद हो, नमाज़ हो कि आरती।विभिन्न पंथ पर्व से, वसुंधरा सँवारती।अनेक भिन्न बोलियाँ, सुपुत्र को पुकारती।निनाद नृत्य गान से, प्रसन्न भव्य भारती।नई उड़ान है यहाँ, नया यहाँ प्रभात है।ममत्व मातृ अंक में, मिला मुझे विराम है॥पवित्र पुण्य भारती, प्रणाम है प्रणाम है॥स्वरचितविवेक अग्रवाल 'अवि'You can write to me on HindiPoemsByVivek@Gmail.com
कथा सुनो सुभाष की, अदम्य स्वाभिमान की।अज़ाद हिन्द फ़ौज के, पराक्रमी जवान की॥अनन्य राष्ट्र प्रेम की, अतुल्य शौर्य त्याग की।सहस्त्र लक्ष वक्ष में, प्रचंड दग्ध आग की॥सशस्त्र युद्ध राह पे, सदैव वो रहा डटा। समस्त विश्व साक्ष्य है, नहीं डरा नहीं हटा॥असंख्य शत्रु देख के, गिरा न स्वेद भाल से।अभीष्ट लक्ष्य के लिए, लड़ा कराल काल से॥अतीव कष्ट मार्ग में, सुपुत्र वो नहीं रुका। न लोभ मोह में फँसा, न शीश भी कभी झुका॥स्वतंत्र राष्ट्र स्वप्न को, समस्त देश को दिखा।कटार धार रक्त से, नवीन भाग्य भी लिखा॥अभूतपूर्व शौर्य का, वृत्तांत विश्व ये कहे।सुकीर्ति सपूत की, सुगंध सी बनी रहे॥समान सूर्य चंद्र के, अमर्त्य दीप्त नाम है। सुभाष चंद्र बोस को, प्रणाम है प्रणाम है॥_____________________Lyrics - Vivek Agarwal AviMusic & Vocal - SunoAI
Shri Ram Chandra Stuti

Shri Ram Chandra Stuti

2024-09-0504:13

रघुपुङ्गव राघवेंद्र रामचन्द्र राजा राम। सर्वदेवादिदेव सबसे सुन्दर यह नाम। शरणत्राणतत्पर सुन लो विनती हमारी। हरकोदण्डखण्डन खरध्वंसी धनुषधारी। दशरथपुत्र कौसलेय जानकीवल्लभ। विश्वव्याप्त प्रभु आपका कीर्ति सौरभ। विराधवधपण्डित विभीषणपरित्राता। भवरोगस्य भेषजम् शिवलिङ्गप्रतिष्ठाता। सप्ततालप्रभेत्ता सत्यवाचे सत्यविक्रम। आदिपुरुष अद्वितीय अनन्त पराक्रम। रघुपुङ्गव राघवेंद्र रामचन्द्र राजा राम। सर्वदेवादिदेव सबसे सुन्दर यह नाम। महादेवादिपूजित मायामारीचहन्ता। दीनानाथ दयासार दान्त दुःखहन्ता। परंज्योति पराकाश परात्पर परंधाम। सुमित्रापुत्रसेवित सर्वदेवात्मक श्रीराम। आजानुबाहु आप अहल्याशापशमन। जयन्तत्राणवरद के चरणों में है नमन। महाबाहो महायोगी पुण्डरीकलोचन। भक्तवत्सल प्रभु कीजिये पापमोचन। रघुपुङ्गव राघवेंद्र रामचन्द्र राजा राम। सर्वदेवादिदेव सबसे सुन्दर यह नाम। ___________________ Lyrics, Prompt Engineering, Production - Vivek Agarwal Avi Vocal - Suno AI
श्री राम नवमी - (हरिगीतिका छंद) श्री राम नवमी पर्व पावन, राम मंदिर में मना। संसार पूरा राममय है, राम से सब कुछ बना॥ संतों महंतों की हुई है, सत्य सार्थक साधना। स्त्री-पुरुष बच्चे-बड़े सब, मिल करें आराधना॥ नीरज नयन कोदंड कर शर, सूर्य का टीका लगा। मस्तक मुकुट स्वर्णिम सुशोभित, भाग्य भारत का जगा॥ आदर्श का आधार हो तुम, धैर्य का तुम श्रोत हो। चिर काल तक जलती रहेगी, धर्म की वह ज्योत हो॥ तन मन वचन सब कुछ समर्पित, जाप हर पल नाम का। अब राम ही अपना सहारा, आसरा बस राम का॥ श्रद्धा सहित समर्पित सुर - डॉ सुभाष रस्तोगी गीतकार - विवेक अग्रवाल "अवि" मूल संगीत - उषा मंगेशकर संयोजन - अमोल माटेगांवकर Write to us on HindiPoemsByVivek@Gmail.com
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