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Pratidin Ek Kavita
Pratidin Ek Kavita
Author: Nayi Dhara Radio
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© Nayi Dhara Radio
Description
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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जब मिलेगी रोशनी मुझसे मिलेगी । रामावतार त्यागीइस सदन में मैं अकेला ही दीया हूँ;मत बुझाओ!जब मिलेगी, रोशनी मुझसे मिलेगी!!पाँव तो मेरे थकन ने छील डालेअब विचारों के सहारे चल रहा हूँ,आँसुओं से जन्म दे-देकर हँसी कोएक मंदिर के दीये-सा जल रहा हूँ;मैं जहाँ धर दूँ क़दम, वह राजपथ है;मत मिटाओपाँव मेरे, देखकर दुनिया चलेगी!!बेबसी, मेरे अधर इतने न खोलोजो कि अपना मोल बतलाता फिरूँ मैं,इस क़दर नफ़रत न बरसाओ नयन सेप्यार को हर गाँव दफ़नाता फिरूँ मैं;एक अंगारा गर्म मैं ही बचा हूँ;मत बुझाओ!जब जलेगी, आरती मुझसे जलेगी!!जी रहे हो जिस कला का नाम लेकरकुछ पता भी है कि वह कैसे बची है,सभ्यता की जिस अटारी पर खड़े होवह हमीं बदनाम लोगों ने रची है;मैं बहारों का अकेला वंशधर हूँ,मत सुखाओ!मैं खिलूँगा, तब नई बगिया खिलेगी!!शाम ने सबके मुखों पर रात मल दीमैं जला हूँ, तो सुबह लाकर बुझूँगा,ज़िंदगी सारी गुनाहों में बिताकरजब मरूँगा, देवता बनकर पुजूँगा;आँसुओं को देखकर मेरी हँसी तुम -मत उड़ाओ!मैं न रोऊँ, तो शिला कैसे गलेगी!!
गैर विद्रोही कविता की तलाश | लालसिंह दिल। सत्यपाल सहगलमुझे गैर विद्रोहीकविता की तलाश हैताकि मुझे कोई दोस्तमिल सके।मैं अपनी सोच के नाखूनकाटना चाहता हूँताकि मुझे कोईदोस्त मिल सके।मैं और वहसदा के लिए घुलमिल जायें।पर कोई विषयगैर विद्रोही नहीं मिलताताकि मुझे कोई दोस्त मिल सके।
मानुष राग । जितेन्द्र श्रीवास्तवधन्यवाद पिताकि आपने चलना सिखायाअक्षरोंशब्दोंऔर चेहरों को पढ़ना सिखायाधन्यवाद पिताकि आपने मेंड़ पर बैठना ही नहींखेत में उतरना भी सिखायाबड़े होकरबड़े-बड़े ओहदों पर पहुँचने वालों कीकहानियाँ ही नहीं सुनाईंछोटे-छोटे कामों का बड़ा महत्त्व बतायासिर्फ़ काम कराना नहींकाम करना भी सिखायाधन्यवाद पिताकि आपने मानुष राग सिखायाबहुत-बहुत धन्यवादयह जानते हुए भीकि पिता और पुत्र के बीचकोई अर्थ नहीं धन्यवाद काधन्यवादकि आपने कृतज्ञ होनाऔर धन्यवाद करना सिखायाधन्यवाद पितारोम-रोम से धन्यवादकि आपने लेना ही नहींउऋण होना भी सिखायाधन्यवादधन्यवाद पिता!!
बड़ी होती लड़की । दीप्ति कुशवाहस्कूल से निकलकरपानठेलाफिर चौराहाआगेकटिंग सैलून तकलड़की नज़र नहीं उठातीकानों में पड़ती उन बातों पर,जिनके अभिप्रायकक्षा में पढ़ाए अर्थों सेहोते हैं सर्वथा ज़ुदाकोई प्रतिक्रिया नहीं दर्शातीपरघर आकर वह चुप नहीं रहतीधर किनारे बस्ते कोमाँ से कहती है रोज़‘स्कर्ट को थोड़ा और लंबा कर दो’
आदमी आदमी से मिलता है। जिगर मुरादाबादीआदमी आदमी से मिलता हैदिल मगर कम किसी से मिलता हैभूल जाता हूँ मैं सितम उस केवो कुछ इस सादगी से मिलता हैआज क्या बात है कि फूलों कारंग तेरी हँसी से मिलता हैसिलसिला फ़ित्ना-ए-क़यामत कातेरी ख़ुश-क़ामती से मिलता हैमिल के भी जो कभी नहीं मिलताटूट कर दिल उसी से मिलता हैकारोबार-ए-जहाँ सँवरते हैंहोश जब बे-ख़ुदी से मिलता हैरूह को भी मज़ा मोहब्बत कादिल की हम-साएगी से मिलता है
उनके बाथरूम में । ज्ञानेन्द्रपति उनके बाथरूम मेंवाशबेसिन के ऊपर लगेआईने की छाँव मेंरखे हैं दो टूथब्रशएक लम्बूतरे प्याले मेंबस माथ-भर दिखतेमुँह से मिलाए मुँहदो टूथब्रशजिस घनिष्ठता कावे एक छायाचित्र हैंवह पिचकी हुई ट्यूब में चिपकी हुई टूथपेस्ट-सीबसज़रा-सी बची हैउनके मुँह भूल गए हैं चूमना एक-दूसरे कोउन दोनों के मुँहदोमुँहेँ हो गए हैंधीरे-धीरेबेडरूम में और, ड्राइंगरूम में औरवहाँ, बाथरूम मेंवाशबेसिन के ऊपर, आईने के छाँव-तलेएक लम्बूतरे प्याले में रखे उनके टूथब्रशमाथ-भर दिखतेएक-दूसरे के गले लगे खड़े हैंअफसोस से भरेआईना उनके अफसोस को दुगना कर रहा है ।
युद्ध और तितलियाँ । दीपक जायसवालतितलियों के दिलउनके पंखों में रहते हैंउनके पास दो दिल होते हैंलड़कियाँ उनके पंखों केप्यार में होती हैंवे उनमें भरती हैं अपना हृदयवे दुनिया कोतितलियों के पंखों के मानिंदख़ूबसूरत देखना चाहती हैं।फूलों की पंखुड़ियाँलड़कियों की आँखेंशांत नदीऔर सर्द मौसममरने नहीं देतेतितलियों को।लेकिन जब कहीं युद्ध छिड़ता हैजब किसी के हृदय को छला जाता हैजब फूल की पंखुड़ियाँसूख करगिरने लगती हैंउस क्षण तितलियाँ बूढ़ी होने लगती हैंउनके रंग पिघलने लगते हैंफिर वे लौटा देती हैं अपने पंखअपनी धरती कोयुद्ध रंगों को निगल जाते हैं।
प्यार करता हूँ | कैलाश वाजपेयीमाथे की आँच सेडोरा सुलगता हैमोम नहीं गलतादेह बंद नदियाउफनाती हैनीली फिर काली फिर श्वेत हो जाती हैदार्शनिक उँगलियों सेचितकबरे फूल नहींझरती है राखअसहाय होता हूँजब-जब रिक्त होता हूँप्यार करता हूँवहीं एक सीढ़ी है नीचे उतरकरदुनिया कहलाने की।सागर के नीचे दरार हैकिरन कतराती हैपत्थर सरकाकरराह निकल जाती हैहवा की चोट सेबाँस झुलस जाता हैहरा-भरा अंधकार होता हूँप्यार करता हूँवही एक शर्त हैज़िंदा रह जाने की।
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है | मीना कुमारीपूछते हो तो सुनो, कैसे बसर होती हैरात ख़ैरात की, सदक़े की सहर होती है साँस भरने को तो जीना नहीं कहते या रबदिल ही दुखता है, न अब आस्तीं तर होती है जैसे जागी हुई आँखों में, चुभें काँच के ख़्वाबरात इस तरह, दीवानों की बसर होती है ग़म ही दुश्मन है मेरा, ग़म ही को दिल ढूँढता हैएक लम्हे की जुदाई भी अगर होती है एक मर्कज़ की तलाश, एक भटकती ख़ुशबूकभी मंज़िल, कभी तम्हीदे-सफ़र होती हैदिल से अनमोल नगीने को छुपायें तो कहाँबारिशे-संग यहाँ आठ पहर होती हैकाम आते हैं न आ सकते हैं बे-जाँ अल्फ़ाज़तर्जमा दर्द की ख़ामोश नज़र होती है.
मौत भी हम से ख़फ़ा हो जैसे। तलअत सिद्दीक़ी नह्टोरीमौत भी हम से ख़फ़ा हो जैसेज़िंदगी एक सज़ा हो जैसेदिल के वीराने में वो यूँ आएफूल सहरा में खिला हो जैसेअपनी बर्बादी पे शर्मिंदा हूँये भी मेरी ही ख़ता हो जैसेअहमियत ये है तुम्हारे ख़त कीमेरी क़िस्मत का लिखा हो जैसेदिल मिरा यूँ हुआ पारा-पाराआइना टूट गया हो जैसेतुम मुझे हाथ उठा कर कोसोकोई मसरूफ़-ए-दुआ* हो जैसेमसरूफ़-ए-दुआ: प्रार्थना में व्यस्तउन के चेहरे पे वो अश्कों की नमीफूल शबनम से धुला हो जैसेबे-वजह मुझ से बिगड़ बैठे हैंमैं ने कुछ उन को कहा हो जैसेन तवज्जो न पयाम और सलाममुझ से वो रूठ गया हो जैसेमौज-ए-बेबाक* की मानिंद* हैं वोकोई तूफ़ाँ में पला हो जैसेमौज-ए-बेबाक: स्वतंत्र लहरमानिंद: की तरहवो ख़फ़ा हो के बहुत शरमाएआइना देख लिया हो जैसेऐसे अंजान बने वो 'तलअ'त'मेरा शिकवा न सुना हो जैसे
बाँस | कन्हैयालाल सेठियास्वयं उगतेनहीं उगाए जातेबाँस,नहीं होतेउनके सुमनकोई फलनहीं उनमेंचंदन की सुवास,पर बिना बाँसनहीं बनती बाँसुरी,ध्वनित होती हैजिसके छिद्रों सेराग रागिनियाँबिना उसकेनहीं बनती कलमजिससे व्यक्त होती हैंजीवन की अनुभूतियाँजो हैं अनमोलवह बिकते हैं कौड़ियाँ के मोल
विश्वास । आभा बोधिसत्वमैंने अपने सिर परजो विश्वास की दीवार खड़ी कीवहाँ यही लिखा बार-बारदुख बहुत छोटा हैख़ुशी बहुत बड़ीछोटे और बड़े के फ़र्क़को जीना ही सागरबन जाना है एक दिनबूँद-बूँदजुड़ कर विश्व
विश्वास बढ़ता ही गया । शिवमंगल सिंह सुमन पथ की सरलता देखकरदो-चार डग जब बढ़ गयातब दृष्टि-पथ के सामनेआकर हिमालय अड़ गया।पथ के अथक अभ्यास परविश्वास बढ़ता ही गया।
पंख दिए आकाश न दोगे | कन्हैयालाल सेठियापंख दिए, आकाश न दोगे?तो जड़ता चेतनता क्या है?फिर क्षमता-दर्बलता क्या है?केवल खेल, अगर रचना को-प्राण दिए, विश्वास न दोगे!व्यर्थ मृत्यु-जीवन की रेखा,निष्फल है कटु-मधु का लेखा,केवल कपट, अगर कोयल को-कंठ दिए, मधुमास न दोगे!हृदय-हीन की भाषा कैसी?मिलन-हीन अभिलाषा कैसी?कैवल व्यंग्य, अगर लोचन को-स्वप्न दिए, आभास न दोगे?पंख दिए, आकाश न दोगे?
बस एक काम यही बार बार करता था । माधव कौशिकबस एक काम यही बार बार करता थाभँवर के बीच से दरिया को पार करता थाउसी की पीठ पर उभरे निशान ज़ख़्मों केजो हर लड़ाई में पीछे से वार करता थाअजीब शख़्स था ख़ुद अलविदा कहा लेकिनहर एक शाम मेरा इंतिज़ार करता थासुना है वक़्त ने उस को बना दिया पत्थरजो रोज़ वक़्त को भी संगसार करता थाहवा ने छीन लिया अब तो धूप का जादूनहीं तो पेड़ भी पत्तों से प्यार करता था
हारमोनियम की दुकान से । कुमार अम्बुजउस पुरानी-सी दुकान पर ग्राहक कोई नहीं थाबस एक बूढ़ा आदमी चुपचाप झुका हुआ एक हारमोनियम परइतना तन्मय और बाकी चीज़ों से इतना बेखबरकि जैसे वह उस हारमोनियम का ही कोई हिस्सावह बार-बार दबा रहा था एक रीड कोशायद उसकी स्प्रंग ठीक नहीं थीधम्मन चलाते हुए उसने कई बार उस रीड को दबायाएक हलका-सा सुर गूँजता था उस भीड़ भरे बाज़ार मेंजो दस क़दम की दूरी तय करते-करते तोड़ देता था दमगज़ब कोलाहल के बीच एक मद्धिम सुर को साध रहा था वह बूढ़ावह चिंतित था कि ठीक तरह से निकले वह सुरवह इस तरह से सुनता था उस मद्धिम सुर कोजैसे इस समय की एक सबसे ज़रूरी आवाज़मुझे याद अ रहे थे वे सारे गीत जिनमें बजता रहा हारमोनियमऔर बचपन की भजन संध्याएँजिनमें हारमोनियम बजाते थे ताऊ तो रुक जाता था पूर्णमासी का चाँदअचानक खुश हुआ वह बूढ़ाऔर तनिक सीधे होते हए धम्मन चलाकरउसने दबाई वही रीड जिसे सुधार रहा था वह बहुत देर से
सारंगी | कृष्णमोहन झाउस आदमी ने किया होगा इसका आविष्कारजो शायद जन्म से ही बधिर होऔर जो अपनी आवाज़ खोजनेबरसों जंगल-जंगल भटकता रहा होया उस आदमी नेजिसने राजाज्ञा का उल्लंघन करने के बदलेकटा दी हो अपनी जीभऔर जिसकी देह मरोड़ती हुई पीड़ा की ऐंठनमुँह तक आकर निराकार ही निकल जाती होअथवा उसने रचा होगा इसेजो समुद्र के ज्वार से तिरस्कृत घोंघे की तरहअकिंचनता के द्वीप पर फेंक दिया गया होऔर जिसकी हर साँस पर काँपकर टूट जाती होउसके उफनते हृदय की पुकारया संभव हैजिसने खो दिया हो अपना घर-परिवारसाथ-साथ रोने के लिए किया हो इसका आविष्कारइस असाध्य जीवन मेंटूटने और छूटने के इतने प्रसंग हैं भरे हुएकि इसके जन्म का कारण कुछ भी हो सकता है…एक पक्षी के मरने से लेकर एक बस्ती के उजड़ने तकइसलिएजीवन के नाम पर जिन लोगों ने सिर्फ दुःख झेला हैउनकी मनुष्यता के सम्मान मेंअपनी कमर सीधी करके सुनिए इसेयह सुख के आरोह से अभिसिंचित कोई वाद्य यंत्र नहींसदियों से जमता हुआ दुःख का एक ग्लेशियर हैजो अपने ही उत्ताप से अब धीरे-धीरे पिघल रहा है…
रीढ़। विश्वनाथ प्रसाद तिवारीकौन-सा अंग हैआदमी के शरीर में सबसे कीमतीप्रेममार्गियों ने कहा दिलज्ञानमार्गियों ने कहा दिमागकर्ममार्गियों ने कहा हाथपर रीढ़ न हो सीधीतो कैसे बनेगा आदमीकैसे खड़ा होगा वहगुरुत्वाकर्षण के विरुद्धखड़े होते हैं बंदर और भालू भीअपनी रीढ़ पर कभी-कभीपर गीदड़ और गधे कभी नहींरीढ़ झुकी है तो हाथ बँधे हैंहाथ बँधे हैं तो बँधी हैं आँखेंआँखें बँधी हैं तो बँधा है मस्तिष्कमस्तिष्क बँधा है तो बँधी है आत्मा।
भाषा । विवेक निराला मेरी पीठ पर टिकीएक नन्ही-सी लड़कीमेरी गर्दन मेंअपने हाथ डाले हुएजितना सीख कर आती हैउतना मुझे सिखाती हैउतने में ही अपनासब कुछ दे जाती है।
अंतरिक्ष की सैर | त्रिलोक सिंह ठकुरेलानभ के तारे कई देखकरएक दिन बबलू बोला।अंतरिक्ष की सैर करें माँले आ उड़न खटोला॥कितने प्यारे लगते हैंये आसमान के तारे।कौतूहल पैदा करते हैंमन में रोज हमारे॥झिलमिल झिलमिल करते रहतेहर दिन हमें इशारे।रोज भेज देते हैं हम तककिरणों के हरकारे॥कोई ग्रह तो होगा ऐसाजिस पर होगी बस्ती।माँ,बच्चों के साथ वहाँमैं खूब करुँगा मस्ती॥वहाँ नये बच्चों से मिलकरकितना सुख पाऊँगा।नये खेल सिखूँगा मैं,कुछ उनको सिखलाऊँगा॥























