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Pratidin Ek Kavita
Pratidin Ek Kavita
Author: Nayi Dhara Radio
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© Nayi Dhara Radio
Description
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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धरती का पहला प्रेमी । भवानीप्रसाद मिश्रएडिथ सिटवेल नेसूरज को धरती कापहला प्रेमी कहा हैधरती को सूरज के बादऔर शायद पहले भीतमाम चीज़ों ने चाहाजाने कितनी चीज़ों नेउसके प्रति अपनी चाहत कोअलग-अलग तरह से निबाहाकुछ तो उस परवातावरण बनकर छा गएकुछ उसके भीतर समा गएकुछ आ गए उसके अंक मेंमगर एडिथ नेउनका नाम नहीं लियाठीक किया मेरी भी समझ मेंप्रेम दिया उसे तमाम चीज़ों नेमगर प्रेम किया सबसे पहलेउसे सूरज नेप्रेमी के मन मेंप्रेमिका से अलग एक लगन होती हैएक बेचैनी होती हैएक अगन होती हैसूरज जैसी लगन और अगनधरती के प्रतिऔर किसी में नहीं हैचाहते हैं सब धरती कोअलग-अलग भाव सेउसकी मर्ज़ी को निबाहते हैंखासे घने चाव सेमगर प्रेमी मेंएक ख़ुदगर्ज़ी भी तो होती हैदेखता हूँ वह सूरज में हैरोज़ चला आता हैपहाड़ पार कर केउसके द्वारेऔर रुका रहता हैदस-दस बारह-बारह घंटोंमगर वह लौटा देती है उसेशाम तक शायद लाज के मारेऔर चला जाता है सूरजचुपचापटाँक कर उसकी चूनरी मेंअनगिनत तारेइतनी सारी उपेक्षा केबावजूद।
मैं किसकी औरत हूँ । सविता सिंहमैं किसकी औरत हूँकौन है मेरा परमेश्वरकिसके पाँव दबाती हूँकिसका दिया खाती हूँकिसकी मार सहती हूँ...ऐसे ही थे सवाल उसकेबैठी थी जो मेरे सामनेवाली सीट पर रेलगाड़ी मेंमेरे साथ सफ़र करतीउम्र होगी कोई सत्तर-पचहत्तर सालआँखें धँस गई थीं उसकीमांस शरीर से झूल रहा थाचेहरे पर थे दुख के पठारथीं अनेक फटकारों की खाइयाँसोचकर बहुत मैंने कहा उससे‘मैं किसी की औरत नहीं हूँमैं अपनी औरत हूँअपना खाती हूँजब जी चाहता है तब खाती हूँमैं किसी की मार नहीं सहतीऔर मेरा परमेश्वर कोई नहीं'उसकी आँखों में भर आई एक असहज ख़ामोशीआह! कैसे कटेगा इस औरत का जीवन!संशय में पड़ गई वहसमझते हुए सभी कुछमैंने उसकी आँखों को अपने अकेलेपन के गर्व से भरना चाहाफिर हँसकर कहा ‘मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन हैमेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रालेकिन कुछ घटित हुआ जिसे तुम नहीं जानतीं-हम सब जानते हैं अबकि कोई किसी का नहीं होतासब अपने होते हैंअपने आप में लथपथ-अपने होने के हक़ से लक़दक़'यात्रा लेकिन यहीं समाप्त नहीं हुई हैअभी पार करनी हैं कई और खाइयाँ फटकारों कीदुख के एक दो और समुद्रपठार यातनाओं के अभी और दो चारजब आख़िर आएगी वह औरतजिसे देख तुम और भी विस्मित होओगीभयभीत भी शायदरोओगी उसके जीवन के लिए फिर हो सशंकितकैसे कटेगा इस औरत का जीवन फिर से कहोगी तुमलेकिन वह हँसेगी मेरी ही तरहफिर कहेगी—‘उन्मुक्त हूँ देखो,और यह आसमानसमुद्र यह और उसकी लहरेंहवा यहऔर इसमें बसी प्रकृति की गंध सब मेरी हैंऔर मैं हूँ अपने पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूरपूर्णतया अपनी'
मेरा घर। पूर्णिमा वर्मनमैंने सुई से खोदी ज़मीन ‘फुलकारियां’ उगाई दुपट्टों परमैंने दीवारों में रचे ‘ताख़’ दीवट वालेमैंने दरवाज़ों को दी राह बंदनवार वालीमैंने आग पर पकाया स्वादअंजुरी में भरा तालाबमैंने कमरों को दी बुहारमैंने नवजीवन को दी पुकारमैंने सहेजाउमरदराज़ों को उनकी अंतिम सांस तकमैंने सुरों को भी छेड़ा बांस तकमेरे पसीने से बहा यश का गानपरमेरे घर पर लिखा तुम्हरा नाम...!
ज़ाइद ज़िन्दगी । शारिक़ कैफ़ीकहानी और होती कुछ हमारीअगर हम वक़्त से सोने की आदत डाल लेतेमगर हम तोन जाने क्या समझते थे सहर तक जागने कोजो हम ने जाग कर काटी हैं नींद आते हुए भीवो ज़ाइद ज़िंदगी हैवो ज़ाइद ज़िंदगी है जिस ने सारे मसअले पैदा किए हैंजिसे जीने मेंख़्वाबों के ये उल्झट्टे हुए हैंज़ाइद: अतिरिक्त
दो बूँदें। जयशंकर प्रसादशरद का सुंदर नीलाकाशनिशा निखरी, था निर्मल हासबह रही छाया पथ में स्वच्छसुधा सरिता लेती उच्छ्वासपुलक कर लगी देखने धराप्रकृति भी सकी न आँखें मूँदसु शीतलकारी शशि आयासुधा की मनो बड़ी सी बूँद!
नींद। आलोक धन्वारात के आवारामेरी आत्मा के पास भी रुकोमुझे दो ऐसी नींदजिस पर एक तिनके का भी दबाव ना होऐसी नींदजैसे चांद में पानी की घास
कोई आवाज़ नहीं। तनवीर अंजुमअनुवाद: रिचर्ड जे कोहेनगर्द हमारे घरों तक फैल गईउस मौसम में कोई बारिश नहींहम ने बादल के आख़िरी टुकड़े को गुज़र जाने दियाअब वो मेरे ना-फ़रमान बेटे की तरहवापस नहीं आएगादुश्मनी हमारे दिलों तक फैल गईउस रात में कोई करामात नहींहम ने पानी को कीचड़ में मिल जाने दियाअब वो बूढ़े की खोई हुई बीनाई की तरह वापस नहीं आएगामौत हमारे जिस्मों तक फैल गईइन गलियों में कोई आवाज़ नहींहम ने ख़ून को सड़कों पर बह जाने दियाअब वो मेरे बिछड़े हुए ख़ुदा की तरहवापस नहीं आएगा
उजड़ा मेरा गाँव। ऋता शुक्लआम नीम महुआ की छायानंदन कानन गाँव हमाराकाशी मथुरा वृन्दावन गंगासागर से अधिक दुलारा चैता फगुआ ढोल झाल से मह मह करती थीं चौपालें कजरी सोहर बारहमासाअंगनाई की गमक संभाले गंगा मईया की गोदी लहरों संग वह डोला पाँतीनिर्गुण की लय साँझ उदासीआजी करती दीया बातीपहली पूजा काली मईयाखीर बताशा भोग लगातीगाँव की उसकी रक्षा करना भोले बाबा से यह विनतीकाम रसोई फिर जब जातीघर-घर अगिल बिताई जातीबालक बूढ़े सब होते पितफिर आती गृहणी की बारीपिछवाड़े की नीम दार से कोयल आती भद बतियाती और सुनहरी पाँखो वाली महुआ शुभ संदेशा लातीहल बैलों की जोड़ी सजतीबद्री काका तड़के उठके भोर भई उठ जाग मुसाफ़िरसुरती मलते हाथ लगाते रामू कर्मा धर्मा मिल कर गेंहूँ चना गवार उगाते अरहर सरसो मड़ुआ मकई फ़सल काटते परब मनाते हँसी ख़ुशी दिन पूरा होता साँझ रात को गले लगाती रामायण की बैठन खुलती ओसारे पर भीड़ उमड़तीदरी बिछाओ रेहन लाओ धूप-दीप से पोथी पूजन तुलसी के दोहे चौपाईराम कथा अनुपम मनभावन सिया राम मय सब जग जाने तान उठाते गिरिधर काका कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥जनक दुलारी के वियोग में वन-वन भटके श्री रघुनन्दन अम्मा की बिछोह में बाबू जी का वह बौराया सा मन गौरैया सा तिनका-तिनका आस जगाती छोटी बहिना बड़की दिदिया को संग लेकर कब लौटेंगे मेरे पहुना दीपू मुन्नू पढ़ने जाते रतनारी अंखियों में काजल कभी कुदीठ न लगने पाएये बालक ही माँओं का धन बेंत सूतते पंडित जी की आँख बचा कर दौड़ लगाते खेल कबड्डी कुश्ती जमती लोट-पोट हो जाती माटी
हमें भूल जाना चाहिए । अफ़ज़ाल अहमद सय्यदउस ईंट को भूल जाना चाहिएजिस के नीचे हमारे घर की चाबी हैजो एक ख़्वाब में टूट गयाहमें भूल जाना चाहिएउस बोसे को (बोसा: चुम्बन)जो मछली के काँटे की तरह हमारे गले में फँस गयाऔर नहीं निकलताउस ज़र्द रंग को भूल जाना चाहिएजो सूरज-मुखी से अलाहिदा दिया गयाजब हम अपनी दोपहर का बयान कर रहे थेहमें भूल जाना चाहिएउस आदमी कोजो अपने फ़ाक़े परलोहे की चादरें बिछाता हैउस लड़की को भूल जाना चाहिएजो वक़्त कोदवाओं की शीशों में बंद करती हैहमें भूल जाना चाहिएउस मलबे सेजिस का नाम दिल हैकिसी को ज़िंदा निकाला जा सकता हैहमें कुछ लफ़्ज़ों को बिल्कुल भूल जाना चाहिएमसलनबनी-नौ-ए-इंसान (बनी-नौ-ए-इंसान: मानव समष्टि)
बड़ी-बी। अनिरुद्ध उमटबड़ी-बी दरवाज़ा खोलोतुम्हारी पानघुँघरू, ख़त लाने में हुई मुझसे देरी बहुत'हम नहीं जानते तुम कौन हो'बड़ी-बी हाथ में ख़त लिएमुँह में पान चबाएछमछम करती दरवाज़े की दहलीज़ पर आहैरान थी'हमने अपने मरने का दिन तय कर रखा थाहमने समझा वह आ गया है'कहती बड़ी-बी मेरी आँखों में झाँक रही थी'ठीक है गड्ढा ठीक ही खुदा है'कहती वह उतरी और एक मुट्ठी मिट्टीहमें दे गई
आदमी अकेला । लीलाधर जगूड़ीतारीख़ें भी तीसऔर आदमी अकेलाहफ़्ते भी चारऔर आदमी अकेलामहीने भी बारहऔर आदमी अकेलाऋतुएँ भी छहऔर आदमी अकेलावर्ष भी अनेकऔर आदमी अकेलाकाम भी बहुत सेऔर आदमी अकेला।
दस से ऊपर। सरवत हुसैनइतने घरइतने सय्यारेकंकर पत्थर कौन गिनेदस से ऊपर कौन गिनेऔज़ारों के नाम बहुत हैंहथियारों के दाम बहुत हैंऐ सौदागर कौन गिनेदस से ऊपर कौन गिनेऐ दिलऐ बे-कल फ़व्वारेकितने घाव बने हैं प्यारेअपने अंदर कौन गिनेदस से ऊपर कौन गिनेकितनी लहरें टूट गई हैं बीच समुंदर कौन गिने
एक अच्छा गाँव । अजेयएक अच्छे आदमी की तरहएक अच्छा गाँव भीएक बहुचर्चित गाँव नहीं होताअपनी गति से आगे सरकताअपनी पाठशाला में ककहरा सीखताअपनी ज़िंदगी के पहाड़े गुनगुनाताअपनी खड़िया सेअपनी सलेट पट्टी पेअपने भविष्य की रेखाएँ उकेरतावह एक गुमनाम क़िस्म का गाँव होता हैअपने कुएँ से पानी पीताअपनी कुदाली सेअपनी मिट्टी गोड़ताअपनी फ़सल खाताअपने जंगल के बियाबानों में पसरावह एक गुमसुम क़िस्म का गाँव होता हैअपनी चटाइयों और टोकरियों परअपने सपनों की अल्पनाएँ बुनताअपने आँगन की दुपहरी मेंअपनी खटिया पर लेटाअपनी यादों का हुक्का गुड़गुड़ाताचुपचाप अपने होने को जायज़ ठहरातावह एक चुपचाप क़िस्म गाँव होता हैएक अच्छे गाँव से मिलनेचुपचाप जाना पड़ता हैबिना किसी योजना की घोषणा किएबिना नारा लगाएबिना मुद्दे उछालेबिना परचम लहराएएक अच्छे आदमी की तरह।
विमानस्पर्धी। ज्ञानेन्द्रपति खगपथों परपक्षियों से जा टकराते हैं विमान, अन्धाधुन्दऔर ध्वन्स का ज़िम्मेदारपक्षी को ठहराया जाता हैबेसबब बेसब्र चील कोदूर धरती के एक कसाईखाने की धुरी पर गगन मँडराते गिद्ध कोजबकि वेखगपथों को मेघपथों से जोड़ने वाली आकासी सिवान पर तारापथ जहाँ से दीख जाता दिन में ही उन्हें -अंक रही अंतिम उड़ानें हैं पक्षीकुल कीजिन्हेंविमान-कम्पनियों और बीमा-कम्पनियों का अभिशाप-किन्हीं का लाभ नीचे, धरती पर, कीटनाशकों का ज़हर बनकर मार रहा हैउनके अण्डों को तुनुक बनाकर तोड़ रहा है, असमयघोंसलों में ही बुझा दे रहा है जीवन-जोत, भ्रूण का अनबना गला टीपकरखेचर प्रजातियों को पोंछ रहा है आकाश सेपंख-भर आकाश के आश्वासन के साथ जिन्हें उपजाया था धरती नेभेजा था आकाश की सैर परजिनके लौट आने काइंतज़ार करती है धरतीऊँचे वृक्षों की फुनगियों में रोपे कानएक बिमान के गर्म लहू से गीली-झुलसी धरतीउस पक्षी का भी शोक करती हैजो लहू की एक बूँद बन चू पड़ावह आकाश का आँसू नहींधरती की उमंग था ।
माँ और आग। विश्वनाथ प्रसाद तिवारीयह उस समय की बात हैजब माचिस का आविष्कार नहीं हुआ थामाँ थोड़ी-सी आग जलाकर रख देतीसवेरे रोटी सेंकने के लिएरात को जब सभी सो जातेमाँ आग को ऐसे ढककर छिपातीएक कोने मेंजैसे कोई रतन हो अमोलजैसे कोई शिशु हो मुलायमजैसे कोई दुल्हन हो लाल-लालमेघ गरजते थे रातों कोकड़कती थी बिजलीखेतों में फेंकरते थे सियारऔर गलियों में रोते थे कुत्तेहम डर से चिपक जातेमाँ की गोद मेंउस अँधेरे की जंग मेंमाँ के लिए कवच-कुंडल थी आगराख से लिपटीमाँ के दिल की तरह धुकधुकातीमाँ के सपनों-सी दहकतीमाँ की इच्छाओं-सी सुलगतीमाँ हमें ढाढ़स देती -‘घर में आग हैतो कोई नहीं आ सकता भूत-प्रेत’अँधेरे में वह धीरे से उठतीआग को और सावधानी सेछिपा देती राख मेंजैसे अपने आँचल से ढककर हमें दूध पिला रही हो।
गोरी सोयी सेज पर । मदन कश्यपशब्द जो नंदिनी के खुर के नीचे दब कर भी नहीं मरे, राजा दिलीप के आतंक से मर गये कालिदास से पूछो कि धमनियों का रक्त पिला-पिला कर कैसे पुनरुज्जीवित किया उन शब्दों कोमैं एक ऐसे टीले पर चक्कर काट रहा हूँजिसके नीचे एक सभ्यता ही नहीं एक भाषा भी दफ्न हैमुझे ढूँढने हैं हजारों शब्दजो कहीं उतनी छोटी-सी जगह में दुबके हैं जितनी-सी जगहतुम्हारे नाखून और उस पर चढ़ी पालिश के बीच बची होती हैतुम्हारे दुपट्टे को लहराने वाली हवा ने हीउन नावों के पालों को लहराया थाजिन पर पहली बार लदे थे हड़प्पा के मृदभाँडइतिहास की अजस्त्र धारा पर अध्यारोपित तुम्हारी हँसीकाल की सहस्त्र भंगिमाओं का मोंताज तुम्हारा चेहरासबसे लंबे समयखंड कोअपनी नन्हीं भुजाओं में समेट लेने को आतुर मेरा मनतुम्हें ढूंढता रहता है अक्षरों से भी पुराने गुफाचित्रों मेंमुझे याद आ रहे हैं अमीर खुसरोसुनो वे तब भी याद आए थेजब पहली और आखिरी बार मैंने तुम्हारे होंठों को चूमा थावह एक यात्रा थी एक भय से दूसरे भय मेंऔर इस तरह भय का बदल जाना भी कम भयानक नहीं होता‘गोरी सोयी सेज पर, मुख पर डारे केसचल खुसरो घर आपने, रैन भयी चहुं देस’छह सौ बहत्तर वर्षों में भी जब तुम्हारे मुख पर से केश हटा नहीं सकातब जाकर एहसास हुआ कि यह रैन इतनी लंबी हैसुबह तो उस रात की होती है जो सूरज के डूबने से हुई होजिसे रच रहे थे अमीर खुसरोकुछ शब्द गुम हो गए उस भाषा केऔर कुछ आततायी व्याकरण की जंग लगी बेड़ियों में कैद हो गएएकल कोशिकीय अनुजीवों के जगल से गुजरते हुएमुझे पहुंचना है उस पनघट परजहां स्वच्छ जामुनी जल की तरह तरल शब्द कर रहे हैं मेरी प्रतीक्षामैं धीरे-धीरे एक विषाल स्पाइरोगाइरा में बदलते जा रहेइस महादेश के जेहन में अपनी कविता के साथ जाना चाहता हूँअंधेरी सुरंगों में सपनों के कुछ गहरे रंग भरना चाहता हूँएक शून्य जो पसरता जा रहा है हमारे चारों ओरमैं उसे पाटना चाहता हूँकविता की आँखों में तैर रहे नये छंदों सेमैं भाषा के समुद्र का सिंदबादअपने पास रखना चाहता हूं केवल यात्राओं की पीड़ाबाकी सबकुछ तुम्हें दे देना चाहता हूँतुम्हें दे देना चाहता हूँअपने अच्छे दिनों में संचित सारे शब्दअपनी बोली की तमाम महाप्राण ध्वनियाँमैं चाँद के रैकेट से सारे सितारों को उछाल देना चाहता हूं तुम्हारी ओर!
आत्मपरिचय। हरिवंशराय बच्चनमैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ;कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकरमैं साँसों के दो तार लिए फिरता हूँ!मैं स्नेह-सूरा का पान किया करता हूँ,मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,जग पूछ रहा उनको,जो जग की गाते,मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ;है यह अपूर्ण संसार न मुझको भातामैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ!मैं जला ह्रदय में अग्नि दहा करता हूँ,सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ;जग भव-सागर तरने को नाव बनाए,मैं भव मौजों पर मस्त बहा करता हूँ!मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ,उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हूँ,जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ!कर यत्न मिटे सब,सत्य किसी ने जाना?नादान वहीं है,हाय,जहाँ पर दाना!फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे?मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भुलाना!मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता!मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,हों जिस पर भूषों के प्रसाद निछावर,मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ,मैं मादकता नि:शेष लिए फिरता हूँ;जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ!
दुश्वारी। जावेद अख़्तरमैं भूल जाऊँ तुम्हेंअब यही मुनासिब हैमगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँकि तुम तो फिर भी हक़ीक़त होकोई ख़्वाब नहींयहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँकम-बख़्तभुला न पाया वो सिलसिलाजो था ही नहींवो इक ख़यालजो आवाज़ तक गया ही नहींवो एक बातजो मैं कह नहीं सका तुम सेवो एक रब्तजो हम में कभी रहा ही नहींमुझे है याद वो सबजो कभी हुआ ही नहीं
तुम्हारी जेब में एक सूरज होता था । अजेयतुम्हारी जेबों में टटोलने हैं मुझेदुनिया के तमाम ख़ज़ानेसूखी हुई ख़ुबानियाँभुने हुए जौ के दानेकाठ की एक चपटी कंघी और सीप की फुलियाँसूँघ सकता हूँ गंध एक सस्ते साबुन कीआज भीमैं तुम्हारी छाती से चिपकातुम्हारी देह को तापता एक छोटा बच्चा हूँ माँमुझे जल्दी से बड़ा हो जाने देमुझे कहना है धन्यवादएक दुबली लड़की की कातर आँखों कोमूँगफलियाँ छीलती गिलहरी कीनन्ही पिलपिली उँगलियों कोदो-दो हाथ करने हैं मुझेनदी की एक वनैली लहर सेआँख से आँख मिलानी हैहवा के एक शैतान झोंके सेमुझे तुम्हारी सबसे भीतर वाली जेब सेचुराना है एक दहकता सूरजऔर भाग कर गुम हो जाना हैतुम्हारी अँधेरी दुनिया में एक फ़रिश्ते की तरहजहाँ औंधे मुँह बेसुध पड़ी हैंतुम्हारी अनगिनत सखियाँमेरे बेशुमार दोस्त खड़े हैं हाथ फैलाएकोई ख़बर नहीं जिनकोकि कौन-सा पहर अभी चल रहा हैऔर कौन गुज़र गया है अभी-अभीसौंपना है माँउन्हें उनका अपना सपनालौटाना है उन्हें उनकी गुलाबी अमानतसहेज कर रखा हुआ हैजो तुमने बड़ी हिफ़ाज़त सेअपनी सबसे भीतर वाली जेब में!
एक राजनीतिक प्रलाप। कुमार अम्बुज यहाँ अब कुछ इच्छाओं का गुम हो जाना सबसे मामूली बात है।मसलन धुएँ के घेरे के बाहर एक जगहया एक ठहाका या एक किताबकबाड़ में ऐसी कई चीज़ें हैं जिन पर जंग और मायूसी हैकबाड़ के बाहर भी ऐसी कई चीज़ें हैं जिन पर जम गई हैं उदासी की परतेंमूर्त यातना जैसा कुछ नहींबर्बरता एक वैधानिक कार्यवाहीजिसके ज़रिये निबटा जा रहा है फालतू जनता सेअखबार और हास्य धारावाहिकों के असंख्य चैनल हैं।कंप्यूटर पर खेल हैं नानाविधमेरे गाँव तक जाने का रास्ता बंद है अभी भीवर्षों पुरानी निर्माणाधीन पुलिया की प्रतीक्षा मेंउस पार करोड़ों लोग हैं जिनके जीवन से इधर कोई सरोकार नहींजो लोग दुर्घटनाओं में मरे उनकी लाशें अभी सड़कों पर हैंशेर, शेर होने के जुर्म में मारे गए हैं।और सियार, सियार होने की वजह सेनिर्दोष मारे गए उस गली में जहाँ वे अल्पसंख्यकयह एक बस्ती अभी-अभी उजड़ी है ज़हरीली शराब सेमेरी माँ के पैर में पिछले नौ बरस से फोड़ा हैहर गर्मी में फूट पड़ती है बेटे की नक़सीरऔर उपाय मेरी पहुँच से दस हज़ार मील दूर हैं उधर एक कवि कूद जाता है तेरहवीं मंज़िल सेएक वह अलग था जिसे चौराहे पर पुलिस ने मार डाला था लाठियों सेफिर भी करोड़ों लोग हैं जो जीवित रहने के रास्ते पर हैंमैं ख़ुद ज़हर नहीं खा पा रहा हूँ और ठीक-ठीक नहीं कह सकता कि यह एक आशा हैकायरता है या साहसइतनी ज़्यादा मुश्किलें हैं जिनमें जीवित हैं लोगकरोड़ों लोग गरीबी के नर्क में हैंकरोड़ों बच्चे झुलस रहे हैं फैक्ट्रियों मेंकरोड़ों स्त्रियाँ जर्जर शोकमय शरीरों में मुस्करा रही हैंअदृश्य सुखों की प्रतीक्षा में हाड़ तोड़ रहे हैं करोड़ों लोगजो भी मुश्किलें हैं वे करोड़ों की गिनती में हैंऔर नामुमकिन-सा ही है उनका बयानअभाव और बीमारी-हज़ारों लोहकूटों द्वारा कूट दिए गए शब्द हैंकरोड़ों ऐसे फ़ैसले लिए गए हैं हमारे वास्ते जिनमें हम शामिल नहींलोग पसीज रहे हैं मगर दाँव पर कुछ नहीं लगा पा रहेजिन्हे दुःखों को पार करना था वे अब रह रहे हैं दुःखों के ही साथअंत में मेरे पास फिर वही कुछ निराश शब्द बचे रहते हैंचमक-दमक और रईसी के बीच चमकते हैं करोड़ों पैबंदअनंत आश्वासनों के बीच मेरे पास कोई नारा नहीं हैन मैं मारो-काटो-बचाओं कह सकता हूँ मैं ही क्या करोड़ों लोग हैं जो इतनी आपाधापी में हैंकि रोज़ी-रोटी के अलावा बमुश्किल ही कर सकते हैंकोई और काम।























