DiscoverPratidin Ek Kavita
Pratidin Ek Kavita
Claim Ownership

Pratidin Ek Kavita

Author: Nayi Dhara Radio

Subscribed: 12Played: 73
Share

Description

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
1057 Episodes
Reverse
क़लम तेरे हाथ में है । भवानीप्रसाद मिश्रक़लम तेरे हाथ में है, जो चाहे सो लिखकुछ न सूझे तो अपना नाम लिखक्या ज़रूरी है कि जो कुछ लिखा, वह छपे भीन छपे सही अँगीठी के काम आएगा कभीदम होगा तो धधक जाएगाबोदा होगा तो बुझ जाएगालिखने की बेला बड़ी पावन होती हैसूखे मन के लिए सावन होती हैरोशनाई और क़लम का संयोग होता हैमन को सँजोने का प्राणान्तक योग होता हैक़लम तेरे हाथ में है, ललकार कर लिखकाग़ज़ हज़ार काले हों, मग़र कालिख़ न लिख।
नींद उचट जाती है । नरेंद्र शर्माजब-तब नींद उचट जाती हैपर क्या नींद उचट जाने सेरात किसी की कट जाती है?देख-देख दु:स्वप्न भयंकर,चौंक-चौंक उठता हूँ डरकर;पर भीतर के दु:स्वप्नों सेअधिक भयावह है तम बाहर!आती नहीं उषा, बस केवलआने की आहट आती है!देख अँधेरा नयन दूखते,दुश्चिंता में प्राण सूखते!सन्नाटा गहरा हो जाता,जब-जब श्वान श्रृगाल भूँकते!भीत भावना,भोर सुनहलीनयनों के न लाती है!मन होता है फिर सो जाऊँ,गहरी निद्रा में खो जाऊँ;जब तक रात रहे धरती पर,चेतन से फिर जड़ हो जाऊँउस करवट अकुलाहट थी, परनींद न इस करवट आती है!करवट नहीं बदलता है तम,मन उतावलेपन में अक्षम!जगते अपलक नयन बावले,थिर न पुतलियाँ, निमिष गए थम!साँस आस में अटकी, मन कोआस रात भर भटकाती है!जागृति नहीं अनिद्रा मेरी,नहीं गई भव-निशा अँधेरी!अंधकार केंद्रित धरती पर,देती रही ज्योति चकफेरी!अंतर्नयनों के आगे सेशिला न तम की हट पाती है!
मुझे तेज़ धार वाली कविताएँ चाहिए । प्रतिभा कटियारमुझे तेज़ धार वाली कविताएँ चाहिएजिनके किनारे से गुज़रते हुए लहूलुहान हो जाए जिस्मजिन्हें हाथ लगाते ही रिसकर बहने लगेसब कुछ सह लेने वाला सब्रमुझे ढर्रे पर चलती ज़िंदगी के गाल परथप्पड़ की तरह लगने वाली कविताएँ चाहिएकि देर तक सनसनाता रहे ढर्रे पर चलने वाला जीवनऔर आख़िर बदलनी ही पड़े उसे अपनी चालमुझे बारूद सरीखी कविताएँ चाहिएजो संसद में किसी बम की तरह फूटेंऔर चीरकर रख दें बहरी सरकारों केकानों के परदेमुझे बहुत तेज़ कविताएँ चाहिएसाँसों की रफ़्तार से भी तेज़समय की गति से आगे की कविताएँजो हत्यारों के मंसूबों को बेधती कविताएँऔर हो चुकी हत्याओं के ख़िलाफ़गवाह बनती कविताएँमुझे चाहिए कविताएँ जिनसेऑक्सीजन का काम लिया जा सकेजिन्हें घर से निकलते वक़्तकिसी सुरक्षा कवच की तरह पहना जा सकेजिनसे लोकतंत्र कोभीड़तंत्र होने से बचाया जा सकेमुझे चाहिए इतनी पवित्र कविताएँ कि उनके आगे सजदा किया जा सकेरोया जा सके जी भर केऔर सजदे से उठते हुए हल्का महसूस किया जा सकेमुझे चूल्हे की आग सी धधकती कविताएँ चाहिएखेतों में बालियों सी लहलहाती कविताएँ चाहिएमुझे मोहब्बत के नशे में डूबी कविताएँ चाहिएऔर भोली गिलहरी सी फुदकती कविताएँ चाहिएमुझे इस धरती परमनुष्यता की फ़सल उगाने वाली कविताएँ चाहिए।
मौन । सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'बैठ लें कुछ देर,आओ, एक पथ के पथिक-सेप्रिय, अंत और अनंत के,तम-गहन-जीवन घेर।मौन मधु हो जाएभाषा मूकता की आड़ में,मन सरलता की बाढ़ में,जल-बिंदु-सा बह जाए।सरल अति स्वच्छंदजीवन, प्रात के लघुपात से,उत्थान-पतनाघात सेरह जाए चुप, निर्द्वंद।
बस एक वचन।  मृदुला शुक्लाजब तुम मुझसे कर रहे थे प्रणय निवेदनतुम्हारी गर्म हथेलियों के बीचकंपकंपा रहा था मेरा दायाँ हाथउसी वक़्त, तुम्हारे कमरे की दीवार परमेरे सामने टंगी थी एक तस्वीरजिसमे एक जवान औरत पीस रही थी चक्कीऔर बूढ़ी औरत दे रही थी चक्की के बीच दानेपास ही आधा पड़ा खाली मटकाउन्हें उनकी अगली लड़ाई की याद दिला रहा थाउसी तस्वीर में एक जवान आदमी दीवार से सर टिकागुडगुडा रहा था हुक्काएक बूढा वही बैठा बजा रहा था सारंगीमुझे स्वीकार है तुम्हारा प्रणय निवेदनबिना सात फेरों के बिना सातों वचन के!बस एक वचन किजब मेरा बेटा कर रहा हो प्रणय निवेदन अपनी सहचरी सेतो उसके पीछे दीवार पर टंगी तस्वीर मेंबूढ़ी औरत बजा रही हो सारंगीबूढ़ा गुडगुडा रहा हो हुक्काऔर जवान औरत और आदमीमिल कर चला रहा हो चक्कीसुनो ! क्या तुम मेरे लिए,बदल सकते हो दीवार पर टंगी इस तस्वीर के पात्रों की जगह भी?
घर पे ठंडे चूल्हे पर अगर ख़ाली पतीली है।अदम गोंडवीघर पे ठंडे चूल्हे पर अगर ख़ाली पतीली हैबताओं कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली हैभटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सीये सुब्हे-फ़रवरी बीमार पत्नी से भी पीली हैबग़ावत के कँवल खिलते हैं दिल के सूखे दरिया मेंमैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली हैसुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास हो कैसेमुहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है
पानी और धूप । सुभद्राकुमारी चौहानअभी अभी थी धूप, बरसनेलगा कहाँ से यह पानीकिसने फोड़ घड़े बादल केकी है इतनी शैतानी।सूरज ने क्‍यों बंद कर लियाअपने घर का दरवाजा़उसकी माँ ने भी क्‍या उसकोबुला लिया कहकर आजा।ज़ोर-ज़ोर से गरज रहे हैंबादल हैं किसके काकाकिसको डाँट रहे हैं, किसनेकहना नहीं सुना माँ का।बिजली के आँगन में अम्‍माँचलती है कितनी तलवारकैसी चमक रही है फिर भीक्‍यों खाली जाते हैं वार।क्‍या अब तक तलवार चलानामाँ वे सीख नहीं पाएइसीलिए क्‍या आज सीखनेआसमान पर हैं आए।एक बार भी माँ यदि मुझकोबिजली के घर जाने दोउसके बच्‍चों को तलवारचलाना सिखला आने दो।खुश होकर तब बिजली देगीमुझे चमकती सी तलवारतब माँ कर न कोई सकेगाअपने ऊपर अत्‍याचार।पुलिसमैन अपने काका कोफिर न पकड़ने आएँगेदेखेंगे तलवार दूर से हीवे सब डर जाएँगे।अगर चाहती हो माँ काकाजाएँ अब न जेलखानातो फिर बिजली के घर मुझकोतुम जल्‍दी से पहुँचाना।काका जेल न जाएँगे अबतूझे मँगा दूँगी तलवारपर बिजली के घर जाने काअब मत करना कभी विचार।
इस जनम में । राजुला शाहअचरज हो तुमएक दु:स्वप्न से जगकमरे मेंअलस्सुबहपरदे उड़ाते आतीहवा-सा अचरज।इसके आगे मगरमुझे कुछ याद नहींजगता हूँ तो स्वप्न भुला जाता हैसोता हूँ तो यह संसारजाने कहाँ बिला जाता हैकभी यही भूल जाता हूँकि जागा हूँ या सो रहाफिर भीइस जनम मेंतुमसे हीबाकी सबअपनी जगह पर हैइसलिएमैं कहीं भी रहूँतुम यहीं रहनामैं कुछ भी कहूँतुम यही कहनामैं हूँमैं रहूँगी।
जिसको बचपन में देखा । माधव कौशिकजिसको बचपन में देखा वो पनघट पोखर ढूंढूंगा।अगली बार गाँव में जाकर फिर अपना घर ढूंढूंगा।ऐसा लगता है टाँगे ही टाँगे हैं अब लोगों की,मुझको मौका मिला तो सबके कटे हुए सर ढूंढूंगा।शहरों की शैतानी आँतें लीले गईं हर चीज़ मगर,दिल की बच्चों जैसी ज़िद के तितली के पर ढूंढूंगा।बुरे दिनों ने सिख लायी है जीने की तरकीब नई,जो कुछ चौराहे पर खोया घर के अन्दर ढूंढूंगा।तुम मेरे चेहरे पर लिखना इन्द्रधनुष उम्मीदों के,मैं तेरी सूनी आँखों में नीला अम्बर ढूंढूंगा।हो सकता है मुझे देखकर फिर छिप जाए जँगल में,मैं अपनी खोई फितरत को भेस बदलकर ढूंढूंगा।अगली बार गाँव में जाकर फिर अपना घर ढूंढूंगा।
न था कुछ तो ख़ुदा था। मिर्ज़ा ग़ालिबन था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होताडुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होताहुआ जब ग़म से यूँ बे-हिस तो ग़म क्या सर के कटने कान होता गर जुदा तन से तो ज़ानू पर धरा होताहुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता हैवो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता
बीस बरस बाद ।  सत्यम तिवारी जो जहाँ है वहाँ नहीं मिलेगामरीचिकाएं अब एक पुरानी सदा हैं और उठे हुए हाथ हवा में गिर जाते हैंतय करना मुश्किल है ऐसे में मनुष्य की गतिशुरू ही होता है जिसका कालखंडबीस बरस पूर्वबर्फ़ के टुकड़े-सा चला है मेरा प्यारऔर दूर है तुम्हारा हाथ इतना दूर वास्तुनिष्ठ सत्य जितना वास्तु सेचश्मा आँख से पानी काकि हाथों हाथ लिया जाएगा फौरी सुझाव और साक्ष्यों के अभाव में मिलेगी माफ़ीनिर्देशक छूटे हुए दृश्य से पल्ला झाड़ेगा निर्माता अनाकर्षक किरदार पर डालेगा पर्दातीन बार दिन में लोटे से जल देगाऔर रुकने के आग्रह पर चल देगादेवता ऐसे आएगा कविता मेंजैसे दुर्घटना का साक्ष्य छुपाने को बिल्लीउलट दिशा में दौड़ेने लगेगा तुम्हारा अंतःकरण।
कब याद में तेरा साथ नहीं । फ़ैज़ अहमद फ़ैज़कब याद में तेरा साथ नहीं कब हाथ में तेरा हाथ नहींसद-शुक्र कि अपनी रातों में अब हिज्र की कोई रात नहींमुश्किल हैं अगर हालात वहाँ दिल बेच आएँ जाँ दे आएँदिल वालो कूचा-ए-जानाँ में क्या ऐसे भी हालात नहींजिस धज से कोई मक़्तल में गया वो शान सलामत रहती हैये जान तो आनी जानी है इस जाँ की तो कोई बात नहींमैदान-ए-वफ़ा दरबार नहीं याँ नाम-ओ-नसब की पूछ कहाँआशिक़ तो किसी का नाम नहीं कुछ इश्क़ किसी की ज़ात नहींगर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है जो चाहो लगा दो डर कैसागर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाज़ी मात नहीं
पॉलिटिकल एंड फिज़ीकल मैप्स ऑफ इंडिया।  प्रियंक्षी मोहन अखबार के पीछे सेभेदती हैं पिता की आँखेंएक समय के बादमाँ के हाथ की बनीगर्म, फूली हुई रोटियां भीफफोले सी नज़र आती हैनकारेपन में इतनाघूम लिया है शहर किप्रेम करने के लिए तोमिल जाता है एक कोनामिल ही जाता है पर, "क्या करते हो बेटा?"जैसे सवालों से छुपने केलिए दूर दूर तक कोईजगह नज़र नहीं आती है"दरवाज़े बाई तरफ खुलेंगे"हर रोज़  सुन सुनकर भीपता नहीं चलता किआखिर जाना किस तरफ हैराशन की दुकान मेंजैसे ताखों से झांकते हैं चूहेउसी तरह बाप के दिलाएहुए महंगे कपड़ों की खालीजेबों से  बटुए झांकते हैभाइयों पर ज़िम्मा हैबहनों को ब्याहने काऔर बहनों कोहोने वाले पतियों कीबहनों का दहेज़ बनवाने का  हम उलझे थे सदाऔर उलझे ही रहेंगेऊन के गोलों की तरहहम देश बदलने काजज़्बा रखने वाले युवाएक दिन दिखते ही देखतेपॉलिटिकल और फिज़ीकलमैप्स ऑफ इंडिया में बदल ही जाते हैं
Sapne | Paash

Sapne | Paash

2026-02-1101:36

सपने । पाशअनुवाद : चमनलालसपनेहर किसी को नहीं आतेबेजान बारूद के कणों मेंसोई आग को सपने नहीं आतेबदी के लिए उठी हुईहथेली के पसीने को सपने नहीं आतेशेल्फ़ों में पड़ेइतिहास-ग्रंथों को सपने नहीं आतेसपनों के लिए लाज़िमी हैझेलने वाले दिलों का होनासपनों के लिएनींद की नज़र होना लाज़िमी हैसपने इसलिएहर किसी को नहीं आते
Garibi | Dhoomil

Garibi | Dhoomil

2026-02-1001:30

ग़रीबी । धूमिलग़रीबीएक ख़ुली हुई क़िताबजो हर समझदारऔर मूर्ख के हाथ में दे दी गई है।कुछ उसे पढ़ते हैंकुछ उसके चित्र देखउलट-पुलट रख देतेनीचे ’शो-केस’ के।
Sadak | Dheeraj

Sadak | Dheeraj

2026-02-0901:08

सड़क । धीरज तुम्हारा जाना,मेरा ऐसे छूट जानाजैसे हर साल छूट जाती हैगाँव की एक ख़राब सड़कजिस पर लड़ा जा सके अगले साल का  चुनाव।
पहाड़ी औरत। निर्मला पुतुल वह जो सर पे सूखी लकड़ियों का गट्ठर लादे पहाड़ से उतर रही है पहाड़ी स्त्री अभी-अभी जाएगी बाज़ार और बेचकर सारी लकड़ियाँ बुझाएगी घर-भर के पेट की आग चादर में बच्चे कोपीठ पर लटकायेधान रोपती पहाड़ी स्त्रीरोप रही है अपना पहाड़ सा दुख सुख की एक लहलहाती फसल के लिए पहाड़ तोड़ती, तोड़ रही है पहाड़ी बन्दिश और वर्जनाएं चटाईयाँ बुनते पहाड़ पर काट रही है पहाड़ सा दिन झाड़ू बनाती, बना रही है गंदगी से लड़ने के हथियार खोपा में खोसती फूल खोंस रही है किसी का दिल गाय-बकरियों के पीछे भागते उसके पाँव रच रहे हैं धरती पर सैकड़ों कुँवारे गीत। 
रात में बोट क्लब । हेमंत देवलेकररुकी हुई नावें :जैसे लहरों नेबेतरतीबी से उतार फैंकीअपनी जूतियाँऔर समा गई तलघर मेंउनकी नींद परमछलियों का पहरा हैबंद है पानी का दरवाज़ा चाँद उस पर लटका हैताले की तरह
फूल खिल कर रहेंगे ।  विष्णु नागर तुमने पत्थर बोए तो पत्थर ही उगे लेकिन पत्थरों ने अपने ऊपर मिट्टी जमने नहीं दिया हवा से नमी खींच ली पौधे उगने बढ़ने लगे पौधों ने फूल उगाए फूलों ने ख़ुशबू बिखेरे रंगों की बहार ला दी पत्थर भी महकने लगे पत्थरों ने पत्थर लगने से इन्कार कर दिया तुमने पत्थरों पर बेवफ़ाई का आरोप लगाया जवाब में पत्थरों ने और ख़ुशबू और रंग बिखेर दिए तुम कुछ भी बोओ फूल खिल कर रहेंगे तुम उन्हें कितना ही तोड़ो उजाड़ो वे उग कर रहेंगे वे महक कर रहेंगे रंग बिखेर कर रहेंगे तुम मिट्टी से लड़ नहीं सकते जो पत्थरों को भी अपना घर बना लेती है
क़स्बों में चल पुस्तकालय ।  अनामिका भाषाविद तो मैं नहीं हूँ,पर बचपन में अक्सर ही सोचती थी मैं-हमारी तरफ़ रूठ जाने को क्यों कहते हैं रूस जाना ।औरतें हमारी तरफ़ की रह- रह कर क्यों रूस जाती हैं ।ऐसा क्या आकर्षण है सोवियत रूस में क्या उसका आकर्षण है वे किताबें जो सुन्दर हिंदी अनुवादों में लाती है, चल पुस्तकालय की बड़ी बड़ी वैनेंजब देखो तब  रूस जाने को तैयारकस्बे की ये उदास औरतें जाओ वहाँ न जाने कहाँ लाओ उसे न जाने किसेज़ार निकोलाई कहता था दाँत पीसकर जब किसानों से रूठी हुई औरतें सुनतीं मन ही मन कुछ ठानकर कहतीं हम भी अनंत यात्रा पर निकल जाएँगी हमको अनंत यात्रा पर लिए जाएँगी ये किताबें जो आयीं हैं हमसे मिलने चल पुस्तकालय की बड़ी गाड़ियों मेंएक - दूसरे से कंधे भिड़ाती,आपस में हँसती- बतियाती किताबें जैसे कि वृद्धाएँ-किसी तीर्थयात्रा की बस में सवार एकदम मगन मन में,सोचती हुई ये कि एक पिकनिक तो हुई जीवन में ।चल पुस्तकालय की इन गाड़ियों में सट- सटकर बैठे हुए दीखते थे वेद और क़ुरान, टॉल्सटॉय, चेखव, रवीन्द्र और प्रेमचंद,यशपाल, स्वेताएवा और जैनेन्द्र ।छरियाकर घर से निकल आयी औरतों के जीवन का पहला और अंतिम रोमांस थीं किताबें ।हाथों में पुस्तक आते ही धीरे - धीरे उनकी साँसों में उगने लगती थी नरम दूब पहली बारिश से नहायी हुई ।लंबी- लंबी साँसें खींचने लगती थीं वे जैसे कि पूरी धरती की सुगन्ध खींच लेनी हो इसी वक़्त  कल किसने देखा है ।इन गुप्त किताबी सुरंगों का धन्यवाद इनसे ही होती हुई तो कहाँ से कहाँ निकल गईंदुनिया से रूठी,अन्यायों से टूटी सब औरतें ।कहाँ से कहाँ निकल गईं-इसका इतिहास है गवाह! कहीं तो पहुँचती है अक्सर बेकस की आह।
loading
Comments 
loading