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Pratidin Ek Kavita
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Pratidin Ek Kavita

Author: Nayi Dhara Radio

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Description

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
1079 Episodes
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अखबार | बालस्वरूप राहीजिस दिन होता है इतवार, घर में आते ही अखबार, ऐसी छीन-झपट मचतीहो जाते हैं हिस्से चार!पापा को खबरों का चाव, माँ पढ़ती दालों के भाव,भैया खेलों में रमते, भाता मुझे बनाना नाव
Ghar | Mohan Rana

Ghar | Mohan Rana

2026-03-1602:03

घर | मोहन राणाधन्य धरती है जिसकी करुणा अक्षतधन्य समुंदर जिसका नमक फीका नहीं होताधन्य आकाश जो रहता हमेशा मेरे साथ हर जगह दिन रातधन्य वे बीज जो पतझर को नहीं भूलतेधन्य वे शब्द भूलते नहीं जो चौखट पर कभी बाट लगाते दुखउसकी स्मृति कोधन्य उस विचार पहिए पर टँकी छवियाँजो बन जाती टॉकीज़,आकाशगंगा के छोर चुपचाप परिक्रमा मेंधन्य यह साँस,मैं कैसे भूल सकता हूँ घरऔर कोने पर धारे का पानी
हम क्या जानें क़िस्सा क्या है  | राही मासूम रज़ाहम क्या जानें क़िस्सा क्या है हम ठहरे दीवाने लोगउस बस्ती के बाज़ारों में रोज़ कहें अफ़्साने लोगयादों से बचना मुश्किल है उन को कैसे समझाएँहिज्र के इस सहरा तक हम को आते हैं समझाने लोगकौन ये जाने दीवाने पर कैसी सख़्त गुज़रती हैआपस में कुछ कह कर हँसते हैं जाने पहचाने लोगफिर सहरा से डर लगता है फिर शहरों की याद आईफिर शायद आने वाले हैं ज़ंजीरें पहनाने लोगहम तो दिल की वीरानी भी दिखलाते शरमाते हैंहम को दिखलाने आते हैं ज़ेहनों के वीराने लोगउस महफ़िल में प्यास की इज़्ज़त करने वाला होगा कौनजिस महफ़िल में तोड़ रहे हों आँखों से पैमाने लोग
देखो आहिस्ता चलो | गुलज़ारदेखो आहिस्ता चलो और भी आहिस्ता ज़रादेखना सोच सँभल कर ज़रा पाँव रखनाज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहींकाँच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई मेंख़्वाब टूटे न कोई जाग न जाए देखोजाग जाएगा कोई ख़्वाब तो मर जाएगा
याद रखना | शैलजा पाठक याद रखनावह कहेंगे :कम बोलोकम खाओकम सजोकम घूमोकम हँसोकम खिलखिलाओकम बनाओ दोस्तकम करो सपनेकम होरहो कममेरी दोस्त!तुम कम सुनना...
तेरे सपने में थोड़े हूँ | तेजी ग्रोवरतेरे सपने में थोड़े हूँ पगलीमैं तो बैठा हूँटाट परसजूगरअचार भरी उँगलियाँ चाटता हुआमैं टाट पर थोड़े हूँ पगलीझूलती खाट मेंसो रहा हूँ तेरे पासइतना पासकि तेरा पेट गुड़गुड़ायातो मैंने सोचा मेरा हैभोर तक यहीं हूँ पगलीतू साँस छोड़ेगीतो भींज उठेंगी मेरी कोंपलेंमेरी खुरदरी उँगलियाँनींद की रोई तेरी आँखों परकाँप-काँप जाएँगीऔर तूझपकी भर नहीं जगेगी रात मेंमैं जा रहा हूँ पगलीतेरे खुलने से पहलेउजास में घुल रही है मेरी आँखछूना मटका तो मान लेनामैं आया थाघोर अँधेरे तपते तीर की तरह आया थारात भर प्यासा रहा।
मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ - शिवमंगल सिंह सुमन आज जो मैं इस तरह आवेश में हूँ, अनमना हूँयह न समझो मैं किसी के रक्त का प्यासा बना हूँसत्य कहता हूँ पराये पैर का काँटा कसकताभूल से चींटी कहीं दब जाए भी तो 'हाय!' करतापर जिन्होंने स्वार्थवश जीवन विषाक्त बना दिया हैकोटि-कोटि बुभुक्षितों का कौर तक, छिना लिया हैलाभ-शुभ लिखकर ज़माने का ह्रदय चूसा जिन्होंने और कल ही, बगल वाली लाश पर थूका जिन्होंनेबिलखते शिशु की व्यथा पर दृष्टि तक जिनने न फेरीयदि क्षमा कर दूँ उन्हें, धिक्कार माँ की कोख मेरीचाहता हूँ ध्वंस कर देना विषमता की कहानीहो सुलभ सबको जगत में वस्त्र, भोजन, अन्न, पानी।
मैं नीर भरी | महादेवी वर्मामैं नीर भरी दु:ख की बदली!स्पंदन में चिर निस्पंद बसा;क्रंदन में आहत विश्व हँसा,नयनों में दीपक-से जलतेपलकों में निर्झरिणी मचली!मेरा पग-पग संगीत-भरा,श्वासों से स्वप्न-पराग झरा,नभ के नव रँग बुनते दुकूल,छाया में मलय-बयार पली!मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल,चिंता का भार, बनी अविरल,रज-कण पर जल-कण हो बरसीनवजीवन-अंकुर बन निकली!पथ को न मलिन करता आना,पद-चिह्न न दे जाता जाना,सुधि मेरे आगम की जग मेंसुख की सिहरन हो अंत खिली!विस्तृत नभ का कोई कोना;मेरा न कभी अपना होना,परिचय इतना इतिहास यहीउमड़ी कल थी मिट आज चली!मैं नीर भरी दु:ख की बदली!
Adrak | Ekta Verma

Adrak | Ekta Verma

2026-03-0903:47

 अदरक।  एकता वर्मा इनकी देह दुखों की अंतर्मुखी गाँठों से बनी थी जिन्होंने अपनी कब्रों की मिट्टी ठेलकर अपनी देह के लिए जगह बनाई थी।ये आतताइयों का चरित्र पहचानते थे और उनके द्वारा कच्चा चबाए जाने के खिलाफ सुख की जिह्वा पर कसैलेपन की तरह उतरते थे। वे आघातों को अपनी छाती पर सहते थे इनका आखिरी कतरा  प्रतिबद्धताओं की तीखी गंध से महकता था। वे रक्तबीज जैसे थे, उनके टुकड़े जहाँ गिरते हुजूम की शक्ल में वहीं से उग आते। उनका शरीर लोहे के तंतुओं से बँधा था उनको तोड़कर बंदरबाँट करना आसान नहीं था। एक दिन, इनमें से किसी नेजिसके पिता का नाम शंबूक था,ने किताब का आखिरी पृष्ठ पलटकर कहा- यह हमारी कहानी नहीं है।इस इतिहास को जला देना चाहिए ! द्रोणाचार्य की संतानों वाली सभा चीख उठी-  खीं-खीं, खीं-खीं !!! एक औरत ने जो अहिल्या की परपौत्री थी, और मेड्यूसा की नातिन, ने कहा-मेरी योनि एक मज़दूर की तरह खटते हुए असंतोष का नारा उछालना चाहती है,बलत्कृत कामनाओं के नीचे दबा सुख का स्पन्दन खोज लाना चाहती है।देवराजों की सभा चिल्लाने लगी, नुकेले दांतों से नोचने-फाड़ने लगी छी: छी: दुर्दांत! पतिता! जंगल से खदेड़ी गई जातियों का एक वारिसराजधानी के शिक्षण संस्थान में,शोध-प्रबंध में उद्धृत करने लगा अपने पुरखों के हत्यारों की सूची  साक्षात्कार समिति चीखी- खीं-खीं, खीं-खीं खारिज करो, फेंको, बाहर करो!ये तिरस्कृत, बहिष्कृत, अपमानित होती जातियाँ चाहतीं तो एक तटस्थ, समझौतावादी जीवन चुन सकती थीं।लेकिन सहमति में झुके सारों के बीच जहाँ असहमति की उंगली उठाना अपराध हो, वे ओखली में सिर डालकर मूसलों को चुनौती देना धर्म की तरह चुनते हैं। वे अदरक की तरह जीते थे।इनके होने भर से आतताइयों की नंगई ऐसे उघड़ती थी कि वे चीखते-उछलते दाँत -नाखून दिखाते, बंदरों के हुजूम सा दिखते। वही बंदर जो अदरक का स्वाद नहीं जानते।दरअसल सभ्यता के विकास-क्रम में पिछड़े इन अमानुषों के लिए स्वाद भोग का विषय है जबकि मेहनतकशों के लिए वह संघर्ष का पर्याय थाजिन्होंने अपनी जिह्वा पर रोटी से कहीं ज़्यादा, आंसुओं के स्वाद को चखा था,पसीने और पेशाब को चखा था।
प्रार्थना बनी रही | गोपाल सिंह नेपालीरोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रहीएक ही तो प्रश्न है रोटियों की पीर कापर उसे भी आसरा आँसुओं के नीर काराज है ग़रीब का ताज दानवीर कातख़्त भी पलट गया कामना गई नहींरोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रहीचूम कर जिन्हें सदा क्राँतियाँ गुज़र गईंगोद में लिये जिन्हें आँधियाँ बिखर गईंपूछता ग़रीब वह रोटियाँ किधर गईदेश भी तो बँट गया वेदना बँटी नहींरोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रही
खाना है । प्रियाँक्षी मोहन खाना है"वो" खाना हैक्या खाना है?घर भर पूछेबिटिया सेबिटिया को बसरट लगीकि "वो" खाना हैकल सेवो क्या होताज़रा बताओ?सब पूछे बिटिया सेबिटिया को तोनाम न सूझे कुछ मीठामीठा सूझेटॉफी चॉकलेटमिश्री, कुल्फीक्या है वोइन सब में?बिटिया मुह फुलाएदौड़ेइस कोने उस कोनेपापा मम्मीदादा दादीसब सो गएजब थक केबिटिया कुतरेचीनी चाटेनन्ही चीटी के संग में
बसन्त | केदारनाथ सिंहऔर बसन्त फिर आ रहा हैशाकुन्तल का एक पन्नामेरी अलमारी से निकलकरहवा में फरफरा रहा हैफरफरा रहा है कि मैं उठूँऔर आस-पास फैली हुई चीज़ों के कानों मेंकह दूँ 'ना'एक दृढ़और छोटी-सी 'ना'जो सारी आवाज़ों के विरुद्धमेरी छाती में सुरक्षित हैमैं उठता हूँदरवाज़े तक जाता हूँशहर को देखता हूँहिलाता हूँ हाथऔर ज़ोर से चिल्लाता हूँ –ना...ना...नामैं हैरान हूँमैंने कितने बरस गँवा दियेपटरी से चलते हुएऔर दुनिया से कहते हुएहाँ हाँ हाँ...
जब जब तुम चाहोगे मुझसे । अदीबा ख़ानमजब जब तुम चाहोगे मुझसे एक प्रेम पगी कवितामेरी जान मैं तम्हें टूट कर प्रेम दूँगीमेरे पसंदीदा मौसमों का आगाज़ हो तुमजानते हो मैं तुम्हें शिउली की तरह मिलूँगीहमेशा हर बरस बिखरती रहूँगीतुम्हारे ज़हन के कच्चे रास्तों पर उजली - उजलीसुबह के शफ़्फ़ाफ़ उजालों सीकुछ क्षणों का ये मिलनयूँही न भूल पाओगे तुम,साल दर सालमेरी गन्ध से तुम्हारी स्मृतियाँझंकृत हो उठेगी किसी नाद की तरहमैं वो हूँ जिसकी आँखेंअपने पसंदीदा फूलों के वियोग मेंखुद फूल हो झरती रहीं हैं।मैं दुआओं में अपनीमाँग लूँगी तुम्हारे लिएहर मौसम में तुम्हारे पसंद के फूलकि तुम कभी उन खुशबुओं से महरूम न रहोजिनसे तुम्हें प्रेम हैक्या तुमने देखी है मुझ जैसी कोई बावरीजिसने हमेशा ही चाहा खुशबू हो जाना,कोई ऐसी गन्धजो तुम्हारी श्वास की आवाजाही में बसेइस दुनिया में कुछ लोग ही यूँ जीते हैं किसमझ पाएँ प्रेम के जादू कोऔर उनसे भी कम होते हैं वो लोग जिन्हेंप्रेम समझने की धुनजीने नहीं देती,और देखा जाएतो मरने भी नहीं देतीदर असल कविता मेरे हदय से उठीएक तीखी हूँक हैऔर मैंने कहा भी किजब जब तुम चाहोगे मुझसे एक प्रेम पगी कवितामेरी जान मैं तम्हें दूट कर प्रेम दूँगी।
मुझे तुम मिले! | फणीश्वरनाथ रेणुमुझे तुम मिले!मृतक-प्राण में शक्ति-संचार कर;निरंतर रहे पूज्य, चैतन्य भर!पराधीनता-पाप-पंकिल धुले!मुझे तुम मिले!रहा सूर्य स्वातंत्र्य का हो उदय!हुआ कर्मपथ पूर्ण आलोकमय!युगों के घुले आज बंधन खुले!मुझे तुम मिले!
दौड़ते-दौड़ते प्यार।  नीलेश रघुवंशी वह दौड़ रहा हैदिन ब दिन उसकी भागमभाग बढ़ती ही जा रही हैवह जितना दौड़ता जाता है सड़कें उतनी लंबी होती जाती हैंदिन ब दिन पसरती सड़कें खत्म होने का नाम ही नहीं लेतींमैं उसे प्यार करती हूँ और उसकी दौड़ से भयभीत होती हूँभय खाती हूँ उसकी दिनचर्या से जिसमें कुछ पल भी नहीं उसके पासकोसती हूँ बिना पेड़ और बिना छाँव वाले चौराहों औरसड़कों के किनारों कोउकसाते हैं जो उसे और-और दौड़ने के लिएथकान से उसकी थक जाते हैं कपड़ेपसर जाती है थकान उससे पहले बिस्तर मेंनींद में उसकी गोल घुमावदार सड़कें रास्ते जिनमें गुम होते हुएकसमसाती हैं हमारी दोपहरें उसकी थकी आँखों मेंमैं उससे प्यार करती हूँ और प्यार करते-करते शामिल हो गई दौड मेंअब हम दोनों दौड रहे हैंहम बैठे भी नहीं हैं और किसी के साथ खड़े भी नहीं हैंहम तो बस दौडते जा रहे हैंदौडते-दौडते हमने हमारी ही इच्छाओं को मार डालाहाय री दौड़ तूने दौड़ते-दौड़ते भी हमें प्यार न करने दियामैं दौड़ से चिढ़ती हूँ लेकिन उससे प्यार करती हूँथका हारा सांसारिक प्यार हमारा
रहे न कोई भूखा–नंगा | कोदूराम दलितपराधीन रहकर सरकस का शेर नित्य खाता है कोड़े,पराधीन रहकर बेचारे बोझा ढोते हाथी-घोड़े ।माता–पिता छुड़ा, पिंजरे में रखा गया नन्हा–सा तोता,वह स्वतंत्र उड़ते तोतों को देख सदा मन ही मन रोता ।चाहे पशु हो, चाहे पंछी परवशता कब, किसको भायी,कहने का मतलब यह कि ‘परवशता’ होती दुखदायी।ऐसी दुखदायी परवशता मानव को कैसे भायेगी?औरों की दासता किसी को राहत कैसे पहुँचायेगी?जो गुलाम हैं, उन लोगों से उनके दुख: की बातें पूछो,औ’ हैं जो आज़ाद मुल्क़ के उनके सुख की बातें पूछो।कहा सयानों ने सच ही है आज़ादी से जीना अच्छा,किंतु ग़ुलामी में जिंदा रहने से मर जाना है अच्छा।रह करके गोरों की परवशता में हम क्या-क्या न खो चुके,पर पंद्रह अगस्त सन सैंतालीस को हम आज़ाद हो चुके।यह सब अपने अमर शहीदों के भारी जप-तप का फल है,मिलकर रहें, देश पनपावें तब तो फिर भविष्य उज्जवल है ।आज़ादी पर आँच न आवे लहर-लहर लहराए तिरंगा,हम संकल्प आज लेवें कि रहे न कोई भूखा–नंगा।
 हँसो।  श्रद्धा उपाध्याय कोई गिरे तो तुम उसे उठाते हुए गिरो फिर हँसो तुम्हारी खिलखिलाहट से किसी खंडहर में उड़ जाएंगे चमगादड़ इतिहास में कई अवकाश हैं जिनमें सज जाएगी तुम्हारी हँसी जिस सत्ता ने तुम्हें रोने नहीं दियाउनको जीभ चढ़ा कर हँसो दो जहाँ दस दिशाओं में हँसो हँसो इतना कि बैठकों में रखे बुद्ध की तोंद पिरा जाए उस चुप्पी के सामने हँसो जिसके द्वार तोरण पर लिखा था कि हँसी कड़ जाली हँसो हे री जल्दी जल्दी बहुत सारा
मिल ही जाएगा कभी | अहमद मुश्ताक़मिल ही जाएगा कभी दिल को यक़ीं रहता हैवो इसी शहर की गलियों में कहीं रहता हैजिस की साँसों से महकते थे दर-ओ-बाम तिरे        ऐ मकाँ बोल कहाँ अब वो मकीं रहता है        इक ज़माना था कि सब एक जगह रहते थेऔर अब कोई कहीं कोई कहीं रहता हैरोज़ मिलने पे भी लगता था कि जुग बीत गएइश्क़ में वक़्त का एहसास नहीं रहता हैदिल फ़सुर्दा तो हुआ देख के उस को लेकिन उम्र भर कौन जवाँ कौन हसीं रहता है फ़सुर्दा: मुरझाया हुआ दर-ओ-बाम: (लाक्षणिक) मकान  मकीं: मकान में रहने वाला 
आवारा दिन। पूर्णिमा वर्मनदिन कितने आवारा थेगली गली औरबस्ती बस्तीअपने मनइकतारा थेमाटी कीखुशबू में पलतेएक खुशी सेहर दुख छलतेबाड़ी, चौक, गली अमराईहर पत्थर गुरुद्वारा थेहम सूरजभिनसारा थेकिसने बड़ेख़्वाब देखे थेकिसने ताजमहल रेखे थेमाँ की गोद, पिता का सायाघर घाटी चौबारा थेहम घर काउजियारा थे
एक ख़्वाहिश । सेवक नैयरऔर मैं सोचता हूँयूँहीउम्र भरएक कमरे मेंशतरंज की मेज़ परतुम मुसलसल मुझेमात देती रहोमैं मुसलसल यूँहीमात खाता रहूँअपनीतक़दीर परमुस्कुराता रहूँ
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