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Prime Time with Ravish

Author: NDTV

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Research and Analysis of the day's top stories with Ravish Kumar.
425 Episodes
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इतिहास का इतिहास से ही मुकाबला है. 5 अगस्त अनुच्छेद 370 हटाने के इतिहास से जूझता नजर आ रहा है, क्योंकि इस तारीख को उससे भी बड़ा इतिहास बनने जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले और आम सहमति के बाद मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन होना ही था. चाहे आज या फिर एक साल बाद. कोरोना संकट के दौरान जब पूरी दुनिया इंटरनेट को चरणामृत समझकर पी रही थी, कश्मीर इंटरनेट स्पीड के लिए तरस रहा था.
अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन की तैयारी तेजी से चल रही है. अयोध्या नगरी को सजाया गया है, भजन गाये जा रहे हैं और हर तरफ फूल हैं, पेंटिंग हैं, लेकिन अफसोस की बात यह है कि इस नजारे को देखने के लिए राम जन्मभूमि आंदोलन के जो सबसे बड़े नेता रहे हैं लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को न्योता नहीं दिया गया है. इन दोनों नेताओं ने कोरोना संक्रमण के मद्देनजर उम्र और स्वास्थ्य कारणों से समारोह में शामिल होने में असमर्थता जताई है.
अकबर के किरदार पर बनी फिल्म मुगल-ए-आज़म की उम्र 60 साल हो गई है. अगर आप इस फिल्म की कल्पना से लेकर रिलीज होने की तारीख तक को जोड़ लें तो इस फिल्म की उम्र 76 साल होती है. 5 अगस्त 1960 को रिलीज हुई मुग़ल-ए-आज़म हिंदुस्तान की फिल्मी दुनिया के 107 साल के सफर में 60 साल की बादशाहत रखती है. मुगल-ए-आज़म का न तो कोई वारिस हुआ ना ही कोई के आसिफ जैसा बाप हुआ. इस फिल्म की शूटिंग 1951 से लेकर 1960 तक चली थी यानी तकरीबन 9 साल.
21वीं सदी की नई शिक्षा नीति आई है. 21वीं सदी के बीसवें साल में. सबसे पहले 1968 में शिक्षा नीति बनी थी. फिर 1986 में इसे बनाया गया और 1992 में संशोधित किया गया.कहा जा रहा है कि नई शिक्षा नीति 34 साल बाद आई है. हालांकि साल 2000 और 2005 में NCERT ने प्राथमिक और माध्यमिक स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम को बदला था. 2009 में राष्ट्रीय मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा कानून पास किया गया था. 2017 में यूजीसी ने इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस नियमन जारी किया था.
ऐसे बहुत कम दिन बचे हैं जिस दिन कोई इतिहास न बना हो, दिन के कंधे पर इतिहास का बोझ बढ़ता ही जा रहा है. अब बिना इतिहास के सोमवार या बुधवार आता ही नहीं है. कोई दिन ऐसा नहीं आता जिस दिन लोग ट्विटर पर जयंती,शिलान्यास, जय पराजय,पुण्यतिथि, उद्घाटन, स्थापना दिवस वगैरह वगैरह न मनाते हों. राफेल लड़ाकू विमानों के आने से भारत की ताकत में इजाफा माना जा रहा है. फ्रांस से भारत के लिए रवाना हुए राफेल (Rafale) लड़ाकू विमान की पहली खेप अंबाला एयरबेस पर पहुंच गई है. इससे पहले, जब राफेल विमान के पहले बैच ने भारतीय वायुसीमा में प्रवेश किया तो उनकी सुरक्षा में दो SU30 MKI विमान आसमान में पहुंच गए थे. फ्रांस की कंपनी दसॉल्ट एविएशन (Dassault Aviation) की उत्पादन इकाई से राफेल विमानों ने सोमवार को टेक ऑफ किया था. ये विमान लगभग 7,000 किलोमीटर की दूरी तय कर अंबाला पहुंचे हैं.
बैंकों से जुड़ी खबरें अर्थव्यवस्था की अलग तस्वीर पेश कर रही हैं. एक तरफ निजीकरण की आवाज़ आ रही है तो दूसरी तरफ बैंकों के ऊपर लोन का भार बढ़ता जा रहा है. क्या हमारे बैंक 20 लाख करोड़ के एनपीए का झटका बर्दाश्त कर पाएंगे? अगर ऐसा हुआ तो भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा? विवेक कॉल ने मिंट के अपने लेख में कहा है कि रास्ता यही बचा है कि बैंक अपनी हिस्सेदारी बेचें और बाज़ार से पैसा जमा करें. मतलब साफ है सरकारी बैंकों का निजीकरण. विवेक कॉल ने यह भी लिखा है कि प्राइवेट बैंकों ने नई नौकरियों पर रोक लगा दी है. वे अब लोन वसूली के लिए भर्तियां कर रहे हैं. मतलब कि उन्हें चुनौती दिख गई है कि आने वाले समय में लोन को लेकर क्या होने जा रहा है.
लोकतंत्र की हत्या वो हत्या जो अपनी अपनी राजनीति के हिसाब से होती है. यह एक सच्चाई है कि लोकतंत्र की हत्या होती है. कई प्रकार से होती है. आज हम जिस हत्या की चर्चा करने जा रहे हैं वो राज्यपाल द्वारा की जा रही, की जा चुकी और आगे भी की जाने वाली लोकतंत्र की हत्या है. राज्यपाल लोकतंत्र की हत्या करता भी है और उसे हत्या से बचाता भी है. आप कहेंगे कि लोकतंत्र की हत्या के लिए भला कोई राज्यपाल क्यों बनेगा? तो आपको बता दूं कि एक चुनी हुई सरकार गिर सकती है. लेकिन एक गलत फैसला लेने वाला राज्यपाल गिर नहीं सकता, कोई हटा नहीं सकता. ऐसा नहीं है कि कोई राज्यपाल बनने के बाद ही लोकतंत्र की हत्या करे, ऐसे लोग भी राज्यपाल बनते हैं जो बनने से पहले अपने पदों पर रहते हुए लोकतंत्र और इंसाफ की हत्या कर चुके होते हैं.
उत्तर बिहार में हिमालय से उतरने वाली नदियों की संख्या अनगिनत है. आज तक लोग ये मानते हैं कि क्षेत्र में दुख के सिवाय इन नदियों ने कुछ नहीं दिया है. पर इन नदियों के नाम का दुख से कोई लेना-देना नहीं है. लोगों ने हमेशा से नदियों को देवी के रूप में देखा है. नदियों के नाम,नदी और समाज के रिश्ते को बताते हैं. इन नदियों के नामों में सबसे ज्यादा नाम किसी आभूषण पर रखे गए हैं.
खेती के सवाल को आप सिर्फ उस फ्रेम तक ही सीमित नहीं रख सकते हैं जिसमें हमेशा एक किसान खेतों में होता है. हल जोत रहा होता है या ट्रैक्टर चला रहा होता है या सूखा पड़ने पर आसामान की तरफ देख रहा होता है. ऐसी तस्वीरें किसानों की दिनचर्या हैं. इसलिए सबसे पहले हमें खेती और किसानों को ऐसी तस्वीरों के फ्रेम से निकालना होगा. उसी तरह हमें किसानों को समझने और देखने का भी नज़रिया बदलना होगा. सामाजिक दूरी बनाते हुए ट्रैक्टर से विरोध प्रदर्शन के इस रचनात्मक प्रदर्शन से आप यह बिल्कुल न समझें कि किसान डीज़ल के बढ़े हुए दामों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं. हर समय पेट्रोल और डीज़ल के बढ़े हुए दामों का विरोध किसान ही करें यह ज़रूरी नहीं. मिडिल क्लास अगर 81 रुपये लीटर डीज़ल के दे सकता है तो हमारे किसान मिडिल क्लास से क्यों पीछे रहें. ट्रैक्टर के पीछे ट्रैक्टर , प्रतीकात्मक हैं. बहरहाल, किसानों का विरोध उन तीन अध्यादेशों को लेकर जो जून के महीने में केंद्र सरकार ने लाए हैं. इन्हें कृषि सुधार से संबंधित अध्यादेश कहा जाता है. कोरोना के बीच में इन तीन सुधारों की आवश्यकता क्यों पड़ी, सरकार बता सकती है. संसद में बहस का इंतज़ार क्यों नहीं किया गया, सरकार बता सकती है.
असम एक बार फिर बाढ़ की चपेट में है. 27 लाख से ज्यादा लोग इस बाढ़ से प्रभावित हैं. यहां हर साल बाढ़ आती है और चली जाती है. असम की बाढ़ के बारे में हम इतना ही जानते हैं कि बाढ़ आई थी और चली गई. जैसे बाढ़ आकर चली जाती है वैसे ही एक श‍िकायत भी आकर चली जाती है कि नेशनल मीडिया के लिए असम की बाढ़ बाढ़ नहीं है. दरअसल नेशनल मीडिया के यूपी-बिहार की बाढ़ भी बाढ़ नहीं है. 2008 में कोसी नदी में आई बाढ़ के कवरेज को देखेंगे तो आपको इसका अंदाजा हो जाएगा. जिस असम में नागरिकता संशोधन कानून को देशभर में बहस हुई उस असम की बाढ़ की चर्चा नहीं हो रही है. दरअसल असम में बाढ़ की कहानी और नागरिकता संशोधन कानून की राजनीति की कहानी एक जैसी है.
भारत में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या 10 लाख हो गई है. 20 दिनों के भीतर देश में कोरोना के मामले 5 लाख से 10 लाख पहुंच गए हैं. जितने टेस्ट हो रहे हैं अब ज्यादा लोग संक्रमित हो रहे हैं. पॉजिटिविटी रेट 10.49 प्रतिशत हो गई है. टेस्टिंग के मामले में भारत अभी भी काफी पीछे है. राज्यों के हिसाब से भी देखा जाए तो कई राज्य काफी पीछे हैं. टेस्टिंग में देरी से लोगों की जानें जा रही हैं. कायदे से कोरोना से लड़ने वाले समाज में इस पर और ज्यादा बात होनी चाहिए थी.
राजस्थान का राजनीतिक घमासान उफान पर है. गहलोत और पायलट के बीच खिंची तलवारें आज फिर से लहराईं चमकाईं. स्पीकर द्वारा पायलट खेमे के विधायकों की विधान सभा सदस्यता खत्म करने के नोटिस को सचिन पायलट ने हाइकोर्ट में चुनौती दी है. हाइकोर्ट सुनवाई के लिए राजी हो गया है. पायलट खेमे का पक्ष रखने जहां मुकुल रोहतगी और हरीश साल्वे पहुंचे वहीं कांग्रेस की ओर से अभिषेक मनु सिंघवी पहुंचे.
प्रो. आनंद तेलतुबंडे भीमा कोरागांव केस में बंद है. 22 महीने से इस केस का ट्रायल शुरू नहीं हुआ है. कई महीने तक यह केस महाराष्ट्र सरकार के पास था. और जैसे ही वहां सरकार बदली एनआईए के पास चला गया. प्रो. आनंद गिरफ्तार हुए और कई दिनों से जेल में है. कोरोना के समय में जहां कैदियों को छोड़ने की नीति बन रही थी उसी समय में प्रो. आनंद तेलतुबंडे गिरफ्तार किए जा रहे थे. यह कहानी केवल प्रो. आनंद तेलतुबंडे की नहीं है. ऐसी ही कहानी डॉ. कफील खान की है. वरवरा राव की है. सुधा भारद्वाज की है. आज आनंद के मित्रों और परिजनों ने एक बेवसाइट बनाई. मीडिया से ऐसी कहानियां गायब हो जाती है. बीच-बीच में आती भी है तो फर्क नहीं पड़ता. ऐसा किन मीडिया रिपोर्ट का इन मामलों में फर्क पड़ा है.
सचिन पायलट का निकाला जाना राजस्थान और राजनीति के लिए बड़ी घटना है. इस पर आप सुबह से लगातार कवरेज देख भी रहे है. यह राजनीति अभी कई मोड़ लेगी. इसलिए मैं भी उसे यहीं छोड़ता हूं. उसका कारण है. बिहार से एक बच्चे का मैसेज. उसके पिता फुटपाथ पर पड़े रहे, भर्ती होने के लिए. वीडियो वायरल हुआ तब जाकर उन्हें पटना एम्स में भर्ती किया गया. आज बेटे का मैसेज आया कि सर पापा नहीं रहे. सचिन पायलट तो फिर से मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बन जाएंगे, लेकिन उस बच्चे के मैसेज के बाद मैंने तय किया कि प्राइम टाइम कोरोना पर ही करुंगा. इस महामारी से भारत में 23727 लोगों की मौत हो चुकी है. करीब 24 हजार लोगों की मौत इतनी सामान्य संख्या तो नहीं कि आसानी से बेपरवाह हुआ जा सके. अभी भी हम कई राज्यों में तैयारियों और इंतजाम के चरणों में हैं. भारत टेस्टिंग के मामले में काफी पीछे है, लेकिन जब महामारी इस तरह फैलने लगे तो टेस्टिंग का मतलब क्या रह जाता है?
विचारधीन कैदी. हिंदी के जिस विद्वान ने कैदी के आगे विचाराधीन लगाया होगा उसे विचार पर बहुत भरोसा रहा होगा. इतना तो भरोसा होगा ही कि विचार में देरी है मगर विचार होगा. अगर उसे पता होता है कि विचाराधीन कैदियों के बारे में विचार होने में ही दस से बीस साल लग जाएंगे, तब भी वह विचाराधीन ही कहता? या इसकी जगह विचारविहीन कैदियों का चुनाव करता. अजीब नहीं है कि जिसके बारे में विचार नहीं हो रहा है वह विचाराधीन कैदी है. तेलुगु भाषा के बड़े कवि वरवर राव जिस मामले में गिरफ्तार किए गए हैं उस मामले में 22 महीने से ट्रायल नहीं हुआ. गिरफ्तारी को लेकर गंभीरता है सुनवाई को लेकर नहीं. अब उनका मानसिक और शारीरिक संतुलन बिगड़ता हुआ लग रहा है. वरवर राव कवि और शिक्षक के अलावा राजनीतिक कार्यकर्ता रहे हैं. कांग्रेस-बीजेपी टाइप के राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं, जो चुनाव के बाद एक जैसे हो जाते हैं. इस वक्त वरवरा राव को मुंबई से बाहर तालोजा जेल में रखा गया था, भीमा कोरेगांव केस में. परिवार के लोगों ने बताया कि वरवरा राव का फोन आता है तो लड़खड़ाती आवाज में बातें करने लगे हैं. कई बार ऐसी खबरें आई कि उनकी तबीयत जेल में ठीक नहीं है. हालांकि अब उन्हें अस्पताल शिफ्ट किया गया है.
हत्या विकास की नहीं हुई है हत्या कहानियों की हुई है. हमारी कल्पनाओं की हुई है. हमारी कल्पनाओं में संस्थाएं कब की मर चुकी हैं. जिनसे हमने रेत की जमीन पर लोकतंत्र का घरौंदा बनाया. जिसे कोई लात मार कर तोड़ जाता है. घरौंदा बनाना घर बनाना नहीं होता इन घरौंदो की कोई कहानी नहीं होती इनके टूटते ही कहानियां भी मर जाती हैं. हमारी संस्थाओं की कल्पनाएं मर चुकी हैं. उनकी कहानियां भी मर चुकी हैं. जिस समाज में कहानियां मर जाती हैं उस समाज में कहानियों के मरने से पहले पाठक और दर्शक मर जाते हैं. कहानियां हमेशा एनकाउंटर के पहले मरती हैं.
ढाई लाख की फोर्स है यूपी पुलिस की, इस पुलिस में ढाई लाख लोग काम करते हैं. इसके अलावा कई राज्यों की पुलिस भी सतर्क की गई थी, हरियाणा से लेकर दिल्ली तक. इसके बाद भी 8 पुलिसकर्मियों का हत्यारा विकास दुबे पुलिस के हाथों नहीं पकड़ा गया. उज्जैन के महाकाल मंदिर की सुरक्षा में लगी प्राइवेट सुरक्षा एजेंसी के गार्ड ने पकड़ा और पहचाना.
जैर बोलसोनारो ब्राजील के राष्ट्रपति है, भारत भी आए थे मेहमान बनकर गणतंत्र दिवस पर. देखने के लिए उस चीज को जिसे वे ब्राजील में खत्म कर रहे हैं कि भारत में कितनी बची हुई है. जरूरी नहीं वह चीज लोकतंत्र ही हो. आइसक्रीम भी तो हो सकती है. बोलसोनारो को कोविड-19 हो गया है. गनीमत है कि मास्क पहने हुए हैं और कह रहे हैं कि डॉक्टर की बात मानकर थोड़ा घूमना फिरना कम हो गया है. इसमें भी अपनी तारीफ कर डाली कि यह संक्रमण उनके नेतृत्व की शैली के कारण हुआ है , लोगों के बीच रहने वाले राष्ट्रपति हैं इसलिए कोरोना हुआ है.
हम अपने रिसर्चरों और वैज्ञानिकों को नेताओं और बाबाओं से कम जानते हैं. इसमें अचरज की बात भी नहीं है. हम लोग बाबाजी और उनकी बूटी के बारे में ज्यादा जानते हैं. कम से कम इस महामारी के दौर में बाबा जी की प्रेस कांफ्रेंस तो हो रही है, जबकि होनी चाहिए थी वैज्ञानिकों की. भारतीय आयुर्वि‍ज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने आखिरी प्रेस कांफ्रेंस 11 जून को की थी. जब भारत में कोरोना के 2.5 लाख मामले थे. 26 दिन से कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं हुई और अब संक्रमित मरीजों की संख्या 7 लाख हो गई है. इसलिए इसमें बाबा जी का कसूर नहीं कि आप वैज्ञानिकों के बारे में नहीं जानते. इसलिए बगैर किसी अपराधबोध के इस खबर को सुनिए कि गगनदीप गांग ने इस्तीफा दे दिया है.
नौकरिया नहीं है. यह त्रासदी तो है, मगर इससे भी बड़ी त्रासदी यह है कि रोजगार मुद्दा नहीं है. लाखों की फीस देकर जो नई नस्ल अलग-अलग संस्थानों से निकल रही है वो कहां जाए? कोविड-19 दौर में इस नई पीढ़ी पर बहुत मार पड़ी है. जो लोग नोकरियों में थे उनकी तो नौकरी ही चली गई, इसके बाद भी रोजगार मुद्दा नहीं है. राजनीति का ऐसा समय, जब बेरोजगारी चरम पर हो और मुद्दा न हो तो वह नेता बनने के लिए कमाल का समय होता है. क्योंकि वह आसान होता है. ऐसा नहीं है कि नौजवानों ने कोई कसर छोड़ी हो, उन्होंने हर दरवाज़ा खटखटाया है. अखबारों ने भी छापा है, टीवी ने भी दिखाया है. अगर मीडिया ने नहीं भी दिखाया तो मंत्रियों के ट्वीटर हैंडल पर लाखों की संख्या में फीड़ किए गए. पर असर क्यों नहीं हुआ? इसलिए नहीं हुआ कि राजनीति अब जनता के नियंत्रण में नहीं रही.
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Comments (9)

Sahil Pal

Why so fast forwarded audii

Jul 22nd
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Krushanu Das

please upload the latest episode

Jan 7th
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anurag tiwari

insightful as always

Oct 18th
Reply

Saroj Ghosh

thanks Ravish Kumar Sir

Aug 14th
Reply

Abdul Moqtadir

H

Jun 16th
Reply

vivek tiwari

Supr se upar

Apr 5th
Reply

vivek tiwari

Supr se upar

Mar 18th
Reply

M0_ Shy

Ravish ji rocks!

Dec 2nd
Reply

Aveeta

best as always

Nov 25th
Reply
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