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Prime Time with Ravish

Author: NDTV

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Research and Analysis of the day's top stories with Ravish Kumar.
463 Episodes
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तालाबंदी से बड़ा भारत बंद क्या हो सकता है जिसने करोड़ों लोगों की नौकरियां छीन लीं और जीडीपी को माइनस में पहुंचा दिया. कोरोना की लड़ाई भी हाथ से निकल गई और 6 महीने में 92 हजार से ज्यादा लोग मारे गए. किसान संगठनों ने आज भारत बंद किया था. इस भारत बंद में तमाम विपक्षी दलों के नेता शामिल हुए. विरोध को देखकर लगता ही है कि इस विषय पर कितनी सलाह ली गई होगी. इस बिल को अध्यादेश के जरिए लाया गया. गौरतलब है कि विधेयक राज्यों से भी उनके कई अधिकार छीन लेता है.
25 सितंबर को किसान संगठनों ने कृषि के तीन नए बिलों के खिलाफ भारत बंद का ऐलान किया है. इसी दिन मुंबई में एनसीबी अभिनेत्री दीपिका पादुकोण से ड्रग्स मामले में पूछताछ भी करेगी. जून महीने में अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद कथित इंसाफ के नाम पर गोदी मीडिया लगातार इसी मुद्दे पर कवरेज किए जा रहा है. इस कवरेज में अब दीपिका पादुकोण का नाम भी जुड़ने जा रहा है. अब इसके बीच किसान आ गए हैं तो गलती किसानों की है. किसानों की एक गलती यह भी है कि अपने खेतों में टिड्डी दलों को भगाने के लिए किसानों ने गोदी मीडिया की मदद नहीं ली.
एक ऐसे समय में जब देश की अर्थव्यवस्था में ऐतिहासिक गिरावट आई है. कोरोना संकट और लॉकडाउन की वजह से करोड़ों लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं. बेरोजगारी अपने चरम पर है. ऐसे में कृषि सुधार बिलों के बाद सरकार ने श्रम विधेयक भी संसद में पारित करा लिए हैं. जिन्हें लेकर मजदूरों से लेकर कामगारों के मन में असुरक्षा बढ़ गई है. विपक्ष की गैरमौजूदगी में सरकार ने 15 बिल पारित करा लिए.
मोदी सरकार ने विपक्ष के बहिष्कार के बीच कृषि से जुड़े तीसरे विधेयक को भी राज्यसभा से पारित करा लिया. इस तरह से कृषि को लेकर मोदी सरकार ने अपना एजेंडा पूरा कर लिया है. इस बीच इस कृषि विधेयक का विरोध जारी है. क्यों सरकार कृषि कानून बनाने पर अड़ी हुई है. देश में सबसे बड़ी आबादी खेती पर निर्भर करती है. किसानों की हालत किसी से छिपी नहीं है. कृषि सुधार पहले भी हुए हैं लेकिन किसानों की जरूरत के आगे नाकाफी साबित हुए हैं. मंडी में भी किसानों के लिए हमदर्द नहीं रही हैं. बहुत कम किसानों को अपनी फसल न्यूनतम सर्मथन मूल्य पर बेचने का मौका मिल पाता है.
संसद ने कृषि से जुड़े अहम विधेयकों को पास कर दिया है. पहले लोकसभा और फिर राज्य सभा में ये बिल पास हो चुके हैं. और अब इन पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर का इंतजार है जिसके बाद ये कानून बन जाएंगे. लेकिन इन बिलों को लेकर संसद से सड़क तक विरोध दिखाई दे रहा है. इनमे से एक बिल है कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य संवर्धन और सरलीकरण विधेयक 2020 और दूसरा है कृषक सशक्तिकरण व संरक्षण, कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार विधेयक 2020. ये दोनों विधेयक संसद के दोनों सदनों में पास हो चुके हैं, इन बिलों को लेकर आज किसान बेंगलुरू में भी सड़कों पर उतरे.
हमारे देश में स्कूल कॉलेज एक समान नहीं है, असमानता के सबसे बड़े सामान हैं. खराब कॉलेज, खराब यूनिवर्सिटी और खराब स्कूलों से भरा भारतवर्ष ही खुद को विश्वगुरु कह सकता है. क्योंकि जो अच्छा गुरु होता है वो कभी अपने आप को दुनिया का गुरु नहीं कहता है. एक अच्छा प्रोफेसर हमेशा क्लास में खुद को छात्र कहता है. दुनिया का इकलौत देश है भारत जिसके नेता अपने विशेषणों में विश्वगुरु लगाने की चाह रखते हैं. इसके लिए कहीं कोई एक्जाम नहीं होता है, जिसे देखिए वो हाथ में माइक लिए मंच पर विश्वगुरु-विश्वगुरु कह रहा है. कितना अच्छा होता कि भारत का कोई नेता ये कहता कि भारत को अच्छा छात्र बनना चाहिए. जो जिज्ञासू हो, जो हर चीज जाने, नई नई किताबें पढ़े, भले वो नेता चुनाव हार जाए. मैं कस्बों के कॉलेज की बात कर रहा हूं उनकी दुर्दशा बहुत ज्यादा है. ऑनलाइन...एक नई विभाजन रेखा है, ये कई स्तरों पर आपको दिखेगी. प्राइवेट और सरकारी स्कूलों के बीच, वाईफाई और लैपटॉप से लैस और इससे वंचितों के बीच और उनके बीच भी जो साधन संपन्न है. आप ऑनलाइन पढ़ाई का बोझ उठा सकते हैं, इससे आपकी पढ़ाई और समझ की समस्या खत्म नहीं हो जाती है. छात्र और टीचर के बीच का रिश्ता टूटा है. उसकी जगह नया बन रहा है और बहुत कुछ बिगड़ भी रहा है.
क्या भारत में बेरोजगारी को लेकर कोई आंदोलन चल रहा है? क्या बेरोजगारी के आंदोलन में वे ही युवा शामिल हैं जो जिंदगी के कई साल सरकारी नौकरी की तैयारी में लगा देते हैं ? क्या समाज का कोई तबका इन युवाओं से सहानुभूति भी रखता है? सैकड़ों इंजीनियरिंग कॉलेजों में लाखों रुपये की फीस देकर नौकरी न पाने वाले छात्र इस आंदोलन में शामिल हैं? लाखों लोग कॉन्ट्रैक्ट की नौकरी करते हैं और नौकरी से निकाल दिए जाते हैं.क्या वे इस बेरोजगार आंदोलन में शामिल हैं?
सुप्रीम कोर्ट में सुदर्शन टीवी के प्रसारण पर रोक के बहाने कई सवाल खड़े हो गए हैं. ये वो सवाल है जो कोर्ट के भीतर और बाहर कई मौकों पर उठते ही रहते हैं. क्या कोर्ट के यह सवाल मीडिया की भूमिका उसके फंडिग में कोई बदलाव ले कर आएंगे या फिर अदालत आगे बढ़ जाएगी. पूरी बहस को दो हिस्सों में रखकर देखा जा सकता है. पत्रकारिता की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बैन किया जाना दूसरा हिस्सा है विज्ञापन और फंडिग का.
डेटा तो किसी का भी नहीं है! मजदूर का न मीडिया का न पुलिस का किसी का भी डेटा सरकार के पास नहीं है. कोविड से लड़ाई का वो डेटा है जिससे सब कुछ गुलाबी-गुलाबी दिखाना रहता है. BJD के सांसद ने एक सवाल किया कि तालाबंदी के दौरान अपने घर जा रहे कितने मजदूरों की मौत हुई? अपने लिखित जवाब में केंद्रीय श्रम मंत्रालय (union labour ministry) ने बताया कि तालाबंदी के बाद से लगभग 1 करोड़ चार लाख मजदूरों को पलायन करना पड़ा. लेकिन श्रम मंत्रालय यह बताता है कि इतने मजदूरों ने पलायन किया लेकिन यह नहीं बताता है कि कितने मजदूरों की मौत हुई.
क्या दिल्ली पुलिस उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों में उन लोगों को फंसा रही है या डरा रही है जिन्होने नागरिकता कानून के विरोध में हुए आंदोलन में हिस्सा लिया था. 12 सितंबर को खबर आती है कि पूछताछ के दौरान सीपीएम नेता सीताराम येचुरी, जेएनयू की जयती घोष और योगेन्द्र यादव के भी नाम आए हैं. इन सभी को चार्जशीट में आरोपी नहीं बनाया गया है लेकिन नाम है. इस मामले में कई आंदोलनकारियों ने कई महीने जेल में काटे हैं. दिल्ली पुलिस ने रविवार रात उमर खालिद को गिरफ्तार कर लिया UAPA के तहत. आरोप है कि उमर ने ट्रम्प की यात्रा के दौरान लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए कहा. उमर खालिद पर 18 धारा लगायी गयी है.
जीडीपी अगर -24 प्रतिशत हो जाए तो क्या वह सरकार के लिए मायने नहीं रखती है, रखती होगी. मगर इस पर एक ढंग की प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं हुई है. न विस्तार से कोई बयान आया है. लेकिन अर्थ जगत की खबरें अपने तरीके से बाहर आने का रास्ता खोज ले रही हैं .अगर आप थोड़ा रुककर और मुड़कर इन खबरों को देखेंगे तो पता चलेगा कि कितना कुछ समझना रह गया है और जानना बाकी है. अब तालाबंदी खुल गई है तो उद्योग धंधे चालू हो गए हैं. यहां से देखा जाएगा कि आगे आने वाले वक्त में कैसा सुधार होता है.
मुंबई सिर्फ ईंट, गारे और पसीने से नहीं बनी है. इसकी बुनियाद में कपास और अफीम का भी पैसा लगा है. जिससे मुंबई के लोगों के हाथ में नया पैसा आया. ये आज की बात नहीं है, 17वीं, 18वीं और 19वीं सदी की बात है. जो नही जानते हैं वो जानकर हैरान हो सकते हैं कि मुंबई अफीम से अमीर हुई. मुंबई ही नहीं अफीम के कारण भारत के पश्चिमी तट पर कई पूंजीपति बन गए.
अगस्त में 33 लाख लोगों की नौकरियां चली गईं. ये वो लोग थे जो नियमित सैलरी पर काम करते थे. जुलाई में करीब 48 लाख लोगों की नौकरियां चली गईं, जो सैलरी पर काम करते थे. सिर्फ जुलाई और अगस्त का आंकड़ा मिला लिया जाए तो 81 लाख लोग बेरोजगार हो गए हैं. तालाबंदी के बाद से 2 करोड़ से अधिक सैलरी वाली नौकरियां खत्म हो गईं हैं.
रक्षा मामले जब भी सामने आते हैं, तो अनुभव की सीमा खड़ी हो जाती है. पहले का सिस्टम हुआ करता था कि रक्षा मंत्रालय कवर करने वाले अलग से रिपोर्टर और संपादक हुआ करते थे. स्वास्थ्य मंत्रालय कवर करने वाले रिपोर्टर और संपादक हुआ करते थे. इस तरह न्यूज रूम में कई तरह के संपादक हुआ करते थे, जिनसे आप बात करते थे. जानकारियां लेते थे और मुद्दे को समझते थे. अब यह हर जगह ध्वस्त हो चुका है. बताते चले कि सीमा पर भारत और चीन के बीच तनाव चरम पर है. दक्षिण पैंगॉन्ग में ऊंचे ठिकानों पर भारत की पैठ है. देखिए प्राइम टाइम रवीश कुमार के साथ...
5 अगस्त को अयोध्या में भूमिपूजन के बाद एलान हुआ कि परम वैभव संपन्न भारत के निर्माण का शुभारंभ हुआ है. एक महीना भी नहीं बीता कि 5 सितंबर को शाम 5 बजे नौजवान थाली बजाने लगते हैं. उन्हीं जगहों पर उसी तरह से थाली बजाने लगते हैं जैसा उन्हें 22 मार्च के दिन शाम 5 बजे करने को कहा गया था. यहां यह महत्वपूर्ण है कि इन नौजवानों में से अधिकतर या किसी को थाली बजाने का वक्त पांच महीने बाद भी शाम 5 बजे याद रहा होगा. 5 और 5 की यह तुकबंदी इसलिए नहीं मिला रहा कि हेडलाइन चमकदार हो जाए. बल्कि समझने के लिए थाली बजाने का तरीका राजकीय था यानी प्रधानमंत्री ने जनता से आह्वान किया. जब जनता ने इसे विरोध के रूप में इस्तमाल किया तब क्या वह सरकारी तरीके से अलग रूप दे पाई या उसी के जैसी हो गई. एक ही थाली है. जिस जनता से सरकार बजवाती है वही जनता सरकार को सुनाने के लिए बजाती है. सरकार के पास बोलने के कई मुंह हैं लेकिन सुनने के लिए कोई कान नहीं है. थाली बजाइये या शंख. जनता सरकार के तरीकों को अपना कर थोड़े समय के लिए स्मार्ट तो लग सकती है मगर लंबे समय में सरकार उससे स्मार्ट निकल जाती है.
GDP अंग्रेजी में जितनी खुशनुमा लगती है उतनी हिंदी में सुनने में नहीं लगती है. सकल घरेलू उत्पाद बोलते ही "सकल पदारथ है जग माहीं,करमहीन नर पावत नाहीं" की प्रतिध्वनि सुनाई देने लगती है. भारत की राजनीति में भाषणों का स्तर 10 वीं कक्षा स्तर की वाद-विवाद प्रतियोगिता से उपर नहीं उठ सका है. जब जनता अपनी नागरिकता छोड़ भक्ति में लग जाए तो उसे जनता नहीं जजमान कहना चाहिए.
प्रधानमंत्री अपने भाषणों में अर्थव्यवस्था को लेकर आशावान दिखाई देते हैं.उन्हें लगता है दुनिया की अर्थव्यवस्था जब वापसी करेगी तब भारत की अग्रणी भूमिका होगी. लेकिन IMF के अनुसार G-20 देशों में सबसे खराब प्रदर्शन भारत का है. अगर एशिया के देशों से तुलना करें तो इस महामारी के समय में भी कई देश भारत से बेहतर काम कर रहे हैं. आर्थिक पैकेज की घोषणा सरकार की तरफ से की गयी थी. लेकिन क्या उससे आम लोगों को लाभ हुआ है? नौकरी और काम के अवसर कम हो गए हैं. कभी-कभी तो लोगों को तीन-तीन दिनों तक काम नहीं मिल रहा है.
कोविड-19 के संक्रमण ने बता दिया है कि इस महामारी को कवर करने में भारत का मुख्य मीडिया कितना औसत है. महामारी आने से पहले ही न्यूज रूम से हेल्थ एडिटर और हेल्थ रिपोर्टर का सिस्टम खत्म हो चुका था. जब यह महामारी आयी तो छटनी ने मीडिया के सिस्टम को और छोटा कर दिया. महामारी को कवर करने में मुख्यधारा का मीडिया खासकर टीवी चैनल की कई सीमाएं नजर आ गयी. हम सब इस महामारी को कवर करने में असफल रहे हैं. भारत में अब तक 326 डॉक्टरों की कोरोना से मौत हो चुकी है. लेकिन मीडिया में कवरेज नहीं दिख रहा है.
भारत की जीडीपी वित्त वर्ष की पहली तिमाही में माइनस में आ गई है. भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर माइनस 23.9 फीसदी पर पहुंच गई है. भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की विकास दर माइनस 39 हो चुकी है. यह वो सेक्टर था, जिसे 'मेक इन इंडिया' का झंडा बुलंद करना था. जीडीपी में इस ऐतिहासिक गिरावट को लेकर विपक्षी दल केंद्र सरकार पर हमलावर हैं.
सोशल मीडिया के नेटवर्क ने अब लोगों को आलसी बना दिया है. वे अब शेयर, लाइक और डिस्लाइक के लिए संघर्ष करते हैं, जिसमें एक बूंद पसीना भी नहीं बहता है. आए दिन न जाने कितने ट्रेंड और वीडियो इस सोशल मीडिया के नेटवर्क में आकर गायब हो जाते हैं. प्राइम टाइम के कई एपिसोड में मैंने कई बार कहा कि डेमोक्रेसी इंडेक्स होना चाहिए. आइए देखते हैं रवीश कुमार का प्राइम टाइम...
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Comments (13)

Pratap Nair

This is really a superb episode. Not to be missed 👌👌 #NDTV #PrimeTime #podcasts

Sep 5th
Reply

Saroj Ghosh

Fabulous

Sep 5th
Reply

Pratap Nair

This is one of the best Prime Time shows done by Ravish till date

Sep 2nd
Reply (1)

Sahil Pal

Why so fast forwarded audii

Jul 22nd
Reply

Krushanu Das

please upload the latest episode

Jan 7th
Reply

anurag tiwari

insightful as always

Oct 18th
Reply

Saroj Ghosh

thanks Ravish Kumar Sir

Aug 14th
Reply

Abdul Moqtadir

H

Jun 16th
Reply

vivek tiwari

Supr se upar

Apr 5th
Reply

vivek tiwari

Supr se upar

Mar 18th
Reply

M0_ Shy

Ravish ji rocks!

Dec 2nd
Reply

Aveeta

best as always

Nov 25th
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